Culture and environment

शनिवार, 16 अक्टूबर 2021

बस भारत के सम भारत है - उमराव सिंह

 रात एक ऐसी थी 

जब मैं स्वप्न की दुनिया में 

आजाद परिंदे की तरह 

विचरण कर रहा था 

स्वप्न कुछ ऐसा था 

एक दुनिया थी जहाँ 

कोई लकीर ना थी 

धर्मों के बीच, जातियों के बीच 

एकता और अखंडता 

वहां का धर्म था 

हर किसान को आजादी थी 

खेतों को रोपने का 

विज्ञान के अभिशापों के 

वहां कोई गुलाम ना थे 

अमीरों के 

आत्मबल वहां की पूंजी थी 

रात एक ऐसी थी 

मैने देखा 

हर जंवा में, भगत आजाद को 

हर दिल में 

शेरों से जज्बा को 

अचानक मेरी नींद टूटी 

मैं सोच में डूबा,  

कि वह कौन सा वतन है? 

कौन सी दुनिया है ?

और पल में ही समझ आ गया की सत्य ही वह वतन 

भारत है |


सन्दर्भ : लेखक - उमराव सिंह, प्रकाशित पत्रिका - व्यंजना ( 2004-05),  पृष्ठ - 13 |