Nature, Social dysnomia, Climate change, folk songs and poem, प्रकृति, प्रकृति के सामने, पढाई कैसे करें, Cultural Anthropology and Environment
Culture and environment
शुक्रवार, 31 मार्च 2023
*युगों से सीखना और आज को संवारना है*
सोमवार, 27 मार्च 2023
जमीन की खरीदी बिक्री में धोखाधड़ी
जमीन की खरीदी बिक्री में अनेक तरह के डाक्यूमेंट्स की जांच पड़ताल करनी पड़ती है और तमाम तरह की सावधानियों के बाद भी लोग धोखे का शिकार हो रहे हैं। जमीन खरीदी बिक्री से संबंधित धोखाधड़ी क्या अंत है?
किसी कवि ने लिखा है कि
"कोई वकालत नहीं चलती *जमीन वालों की* ,
"कोई वकालत नहीं चलती *जमीन वालों की,*
जब कोई फैसला आसमान वाला करता है।"
हजारों ऐसे हकीकत किस्से सुने होंगे जिसमें कहा जाता है कि जो आदमी जमीन के साथ धोखा करता है उस जमीन से बनाया गया सम्पत्ति उसका सब कुछ नाश कर देता है या किसी न किसी तरिके से बराबर कर देता है। उससे मिला हुआ धन कभी भी फलता फूलता नहीं है।
जमीन के धोखाधड़ी अक्सर भाई भाई में भी होता है बंटवारे में धोखाधड़ी, जमीन के लेन-देन में धोखाधड़ी करने वाले ऐसे अनेक परिवार हम सब देखे होंगे जो धोखा से पचासों एकड़ जमीन और सम्पत्ति बना लिए, उनका बेटा बहु बिमारी में बरबाद हो गए, बेटा बहु, नाती, पत्नी का कैंसर, दमा और सुगर आदि बिमारियों से मृत्यु हो गया, कुछ बचें हैं वो सड़क दुघर्टना में अपाहिज फिर रहे हैं। बेटे शराब के नशे में धुत कई बार सड़क हादसे में मरते मरते बच रहे हैं धोखाधड़ी से कमाया गया एक रूपिया भी कभी फलता फूलता नहीं है ।
क्या मतलब उस सम्पत्ति का जिसका चैन से सुख नहीं ले पाया, क्या मतलब वो जमीन जो कुल का नाश कर दिया, धोखा से बनाई गई सम्पत्ति का हिसाब ऊपर वाला कर ही देता है वो किसी का हिसाब बाकि नहीं रखता ।
लोग अपने खून पसीने की कमाई से जमीन खरीदते हैं आने वाले बच्चों के लिए घर-द्वार, रोजी-रोटी का सहारा बनाते हैं । और कुछ लोग उस जमीन के लेन-देन में धोखाधड़ी करके अक्सर एक परिवार को परेशानी में डाल देते हैं फिर को परिवार को उसके कारण भटकना पड़ जाता है।
इस प्रकृति के पांच तत्वों आग, पानी, धरती, आकाश और वायु के साथ धोखा नहीं कर सकते, यदि मनुष्य थोड़ा भी चालाकी करके इन पांच तत्वों के साथ यदि धोखा करता है तो उसका न्याय यदि नीचे वाला न्यायालय भी ना कर सके, तो ऊपरवाला अवश्य करता है।
हम सभी ने स्कूल में सदगुरु कबीर साहब की वाणीवचन अवश्य पढ़ें हैं
वे कहते हैं कि -
साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये ।
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू ना भूखा जाए ।
सदगुरु कबीर साहब कहते हैं कि हे प्रभु मुझे ज्यादा धन और संपत्ति नहीं चाहिए, मुझे केवल इतना ही चाहिए जिसमें मेरा परिवार अच्छे से खा सके। मैं भी भूखा ना रहूं और मेरे घर से कोई भूखा ना जाये।
ये संतुष्टि ही सबसे बड़ा धन है मगर आज लखपति, करोड़पति भी संतुष्ट नहीं है ये दुख की बात है। पृथ्वी में हाहाकार मचा हुआ है जमीन, जायदाद के लिए ।
- उमराव सिंह
_____________________