Culture and environment

मंगलवार, 26 मई 2020

In front of Nature

My first poem for all the people of the world



 Title - "In front of nature"

 We are human beings,
 Where are humans?
 We
 Some are Indians, some are American,
 Some European, some Asian
 Any caste, any tribe
 We are human beings,
 Where are you?

 We are human beings,
 In front of nature,
 In front of that truth,
 There are no Indians, no Americans,
 Neither European nor Asian
 Neither african
 There is no caste, no tribe
 We are human beings,
 In front of nature.

 Our breath is from trees,
 Our life is, by nature,
 We are children, of nature,
 Our parent is nature,
 We are human beings,
 In front of nature.

 Our duty is
 We understand its importance,
 We decorate its beauty,
 Let us cooperate together,
 Vow to keep it clean forever,
 We are human beings,
 In front of nature.

 The whole world of nature,
 Pend plant fauna,
 Residents of the sky,
 All are creation of nature,
 We all have a partner,
 With each other,
 No developed
 Neither are there any development,
 Because,
 We are only human beings, in front of nature.

 - umrao Singh
    Blog -
 umraosinghverma.blogspot.com
 (This poem is the first page of my books ready for publication)

प्रकृति के सामने





शीर्षक - "प्रकृति के सामने"

हम मनुष्य हैं,
कहाँ पर मनुष्य हैं ?
हम तो
कोई भारतीय हैं, कोई अमेरिकन हैं,
कोई युरोपी, कोई एशियन
कोई जाति है, कोई जनजाति
हम मनुष्य हैं,
कहाँ पर हैं ?

हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने,
उस सत्य के सामने,
न कोई भारतीय हैं, न कोई अमेरिकन,
न कोई युरोपी, न कोई एशियन
न अफ्रिकन
न कोई जाति है, न कोई जनजाति
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने ।

हमारी सांसे हैं, पेडों से,
हमारा जीवन है, प्रकृति से,
हम संतान हैं, प्रकृति के,
हमारा पालक, प्रकृति है,
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने ।

कर्तव्य है हमारा,
हम समझें इसकी महत्ता को,
हम संवारें इसकी सुंदरता को,
हम मिलकर इसका सहयोग करें,
इसे सदा स्वच्छ रखने का प्रण करें,
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने।

प्रकृति का सारा संसार है,
पेंड पौधे जीव जन्तु,
जल थल आकाश के वासी,
सब प्रकृति के निर्माण हैं,
हम सब एक साथी है,
एक दुसरे का साथ,
कोई विकसित नहीं,
न कोई विकासशील हैं,
क्योंकि,
हम केवल मनुष्य हैं, प्रकृति के सामने।

- उमराव सिंह
   Blog -
umraosinghverma.blogspot.com

शुक्रवार, 15 मई 2020

ओले हैं या जवाब अत्याचार का

*ओले हैं, या जवाब अत्याचार का...*           
                 - _उमराव सिंह_

तेज धुप था, बस थोडी ही देर में तेज बारिश और वो भी खुब बर्फ मतलब ओले और तुफान के साथ...
हम बाजार के एक कोने पर रूक गए.. बारिश, तूफान और बरफ के भयानकता को देखकर ध्यान उस इंसान की ओर जा रहा था जो उस समय बाहर खेत खलिहान में रहा होगा और आसपास छुपने का कोई ठिकाना नहीं रहा होगा, उस पर क्या बीती होगी...
इस बात को अधिकतर लोग जानते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है हर बच्चे के स्कूल कॉलेज के कोर्स में पढाया जा रहा है...
फिर भी डिस्पोजल, पॉलीथिन आदि का उपयोग कम ही नहीं हो रहा है वृक्षारोपण पर गंभीरता बिल्कुल नहीं है  पेट्रोल और डीजल का उपयोग ऐसा बढा कि गांव तरफ लोग तालाब भी बाइक में जाते हैं कार्बन डाइऑक्साइड, या फ्रिज एसी से निकलने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन के स्तर को कम करने का वचन लेने का कर्तव्य, डिस्पोजल या पॉलिथीन का उपयोग बंद करने कर्तव्य केवल सरकार का नहीं, हम तमाम लोगों का है फ्रिज और ए.सी.(एयरकंडीशनर) के बिना लोग रह नहीं पा रहे हैं आधा घण्टा लाइट चली जाए तो बिजली आफिस में सैकड़ों फोन चली जाती है, आज हम अत्यंत सुविधाभोगी हो चुके हैं मिट्टी के फर्स पर टाइल्स बिछा रहे हैं ये सब केवल अपनी सुविधा के लिए ताकि झाडु कम लगाना पडे, टाइल्स लगाओ, बर्तन कम धोना पडे डिस्पोजल लाओ.. जरा अंदाज़ा लगा सकते हैं कि केवल हमारे देश की जनसंख्या सवा अरब है इसमें से केवल पचास प्रतिशत लोग ही दिन में केवल एक पॉलिथीन या डिस्पोजल उपयोग करते होंगे तो केवल एक दिन में कितना प्लास्टिक जमीन पर बिछाया जा रहा है...
इस तरह की सुविधाओं ने प्रकृति को चैन की सांस लेने के लायक नहीं छोडा है और जनजीवन के लिए खतरा बनता जा रहा है और जितनी तेजी से वातावरण पिछले कुछ ही वर्षों में परिवर्तित हुई है विकराल रूप ले रहा है शायद ही सैकड़ों साल पहले ऐसा हुआ होगा...

प्रकृति आज बरफ और तुफान के रूप में चीख चीख कर कह रही है कि अभी भी वक्त है, सुधर जाओ, फेंक दो उन तमाम चीजों को जो प्रकृति का विनाश कर रही है... बडे नहीं तो कम से कम पढने लिखने वाले बच्चे समझें...  कम दुरी में जाना हो तो गर्व के साथ सायकल ही चलाइए, सायकल चलाने में शर्म मत कीजिए कि हम ये हैं, वो हैं, फलाना हैं, ढिकाना हैं तो सायकल कैसे चलाएंगे.. ऐसा मत सोचें बल्कि सुरक्षित भविष्य के लिए ये करना ही होगा, हम जाने अन्जाने वास्तव में अत्याचार ही कर रहे हैं प्रकृति के साथ...
आज हम सभी को प्रकृति के प्रति गंभीर होने की अत्यंत आवश्यकता है और ये हम सभी का कर्तव्य है तभी कल, हम और हमारे आने वाली पीढी सुकून की सांस ले पाएगी...

- उमराव सिंह,
umraosinghverma.blogspot.com

सोमवार, 11 मई 2020

पढाई कैसे करें...

*पढाई कैसे करें...*
                - _उमराव सिंह_

पढाई करने का तरीका, यहाँ दो चीजें ध्यान देने वाली है कि हमें अपने कक्षा का कोर्स को किस तरह पढना चाहिए जिससे हमें चेप्टर का कोई टॉपिक अच्छे से याद रहे, या समझ में आ जाए क्योंकि किसी कॉन्सेप्ट को समझ जाने के बाद याद करने या रटने की जरूरत नहीं पडती, और दुसरी चीज की हमें अपना पढाई को कैरियर बनाने के लिए किस तरह से आगे बढना चाहिए।
एक उदाहरण से बात शुरू करते हैं मेरा एक दोस्त है वो दसवीं के बाद ग्यारहवीं में बायो लिया था अब क्या मन हुआ तो बारहवीं के बाद आईटीआई कर लिया कोपा में, अब आईटीआई के बाद बीएससी में एडमिशन लिया, बीएससी के साथ साथ टाइपिंग क्लास जाता था अब बीएससी के बाद पीजीडीसीए और अभी राजनीति में प्राइवेट एम.ए किया पर किसी में फस्ट डीवीजन नहीं ला पाया, क्योंकि वही, सॉटकट की पढाई...
परीक्षा के दो चार दिन पहले पतली पतली गाइड खरीद लेता था और उसमें आईएमपी समझ के केवल पांच छह प्रश्न पढ लेता था तो ऐसा पढने से यदि अच्छा प्रतिशत आ भी जाए तो विषय का नॉलेज या विषय में पकड नहीं रहता।
अब ऐसा पढने से उसे स्वयं समझ में नहीं आ पाता कि वो  किस फिल्ड में कैरियर बनाना  चाहते हैं।
हां, कुछ दिन वो पीएससी का कोचिंग भी किया... पर कुछ नहीं मिला...

तो ऐसा पढाई केवल पैसा खर्च करना है इससे साफ पता चलता है कि आपने अपना एक लक्ष्य नहीं बनाया है और हां, आजकल के कॉम्पीटिशन के दौर में लक्ष्य बनाना मुश्किल होता है कि हर विषय के पढे लिखे लोगों को आसपास बेरोजगार देख रहे होते हैं, इसलिए पढाई में गंभीर नहीं रहते,
तो ये आइडिया गलत है...
आप कभी भी पढाई कीजिए केवल एक दिशा में पढाई करे़ मलतब जिस विषय में आपका वास्तव में रूचि है बारहवीं या दसवीं के बाद उसी को चयन कीजिए और उसी विषय में जितना आगे तक पढाई होती है पढने की कोशिश कर सकते है जैसे यदि दसवीं के बाद इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र या पत्रकारिता जो भी लिए हैं तो आगे इसी में स्नातक मतलब बी.ए. किए, फिर इसमें से जिसमें रूचि है उसी में एम.ए., एम.फिल., पीएचडी, और रिसर्च लेवल तक, जहाँ तक आप पहुंच पाएं, एक लाइन में पढाई करना चाहिए। और पढाई को जीवन में  कभी भी पतली पतली गाइड से मत कीजिए, हमेशा अपने विषय की किताबें पढिए उन मोटी मोटी किताबों को ऐसे ही सो पीस के लिए नहीं छापा गया है, इससे आपको उस विषय का रियल नॉलेज और विषय में पकड रहेगी तो भविष्य में उस विषय का विषय विशेषज्ञ बन सकते हैं जैसे यदि आप बारहवीं बायोलॉजी के बाद भूगर्भ शास्त्र या फोरेंसिक साइन्स ले लिए तो उसी में आगे बढिए, यदि कम्प्यूटर में रूचि है तो केवल उसी में, संगीत, पेंटिंग, डिजाइनिंग कुछ भी करें केवल एक रास्ते में बढे... और जिस विषय में आगे बढना है उसी में गहन अध्ययन करें...

अब दुसरी बात में आतें हैं कि कैसे पढना चाहिए, अपने पढाई करने वाले कमरे में एक कागज पर लिखकर चिपका दीजिए
  *1.*पढाई, 2. मनन,  3.लेखन 4. स्व आकलन**

मतलब किसी चेप्टर जो आपको पढना है बिल्कुल फ्री होकर सरसरी तौर एक बार पढ लीजिए फिर किताब बंद कर दीजिए, अब  टहलते हुए या कुछ काम करते हुए, या ध्यानमुद्रा में बैठकर आपने कुछ देर पहले जो पढा है उसी को मनन कीजिए, आपको पहली बार में ध्यान में नहीं आएगा, पर धीरे धीरे दिमाग में कुछ टुटा फूटा सा या बिल्कुल लाइन बाइ लाइन दिमाग में आने लगेगा..
फिर जब पुरा मनन हो जाए, तो उसको बिना देखे लिखने की कोशिश कीजिए, आपसे जैसा टुटा फूटा लिखाए, बस लिखते जाइए...
फिर उसी लिखे हुए को पढे हुए से मिलाइए... इस विधि से पढाई करने से आपका स्कूल, कॉलेज या प्रतियोगिता परीक्षा के टॉपिक्स भी बडी आसानी से तैयार होता है
.... तो एक बार कोशिश जरूर कीजिए...

- उमराव सिंह
umraosinghverma.blogspot.com

सूबह कौआ दिखा

"सुबह कौआ दिखा"
                     - उमराव सिंह

रोज की तरह आज सुबह साढे पांच बजे जब मैं छत पर गया, और कुछ देर ध्यान, आलोम विलोम और भ्रामरी का दौर चल रहा था उठा तो दुसरे छत पर दो कौएं दिखाई दिए, सच मानिए मैं बहुत वर्षों बाद कौंआ देखा, जब 1990- 91 में शुरू शुरू स्कूल जाना शुरू किए थे उस समय गांव के घर में और आसपास बहुत अधिक संख्या में कौआ आते थे बचपन में जब भात का अंगरा रोटी खाते बैठे रहते थे तो कौआ आसपास में कांव कांव अवश्य करते रहता था और हम बच्चे उसे रोटी का टुकरा दे दे कर खुश होते थे... मैने नीचे गया और कुछ चावल और एक बर्तन में पानी लाकर छत में रख दिया,
हमारा बेमेतरा फैक्टरी वाला औद्योगिक क्षेत्र नहीं है वास्तव में अभी इधर चिडिय़ा विलुप्त नहीं हुए हैं परंतु संख्या अवश्य कम हो गया है, बेमेतरा कृषि उद्योग क्षेत्र हैं यहाँ मुख्यतः खेती होती है चना के उत्पादन के लिए ये क्षेत्र प्रसिद्ध है इस तरह खेत खलिहान होने के कारण यहाँ पेड पौधों और हरियाली की मात्रा पर्याप्त है तो चिडियों का चहचहाना भी स्वाभाविक है
मगर औद्योगिक क्षेत्रों में जहाँ बडी बडी कंपनियां बनी, और इनसे निकले हुए धुएं, प्रदुषण, मोटर गाडियों के धुएं, विविध मोबाइल टावर के तरंगे चिडियों के जीवन के लिए खतरा बना हुआ है इस विषय को हाल ही में एक फिल्म में देखाया भी गया हैं
कोयल की आवाज तो सुबह से आ रही है, सुबह के चिर शांत वातावरण में जब कोयल की आवाज गुंजायमान होती है इससे सभी भलिभांति परिचित हैं, आप भी अपने आसपास अनुभव किए होंगे कि कुछ दिनों से चिडियों की चहचहाना फिर से सुनाई देने लगी है एक उम्मीद की पृथ्वी में छाई हुई प्रदुषण का घोर अंधेरा कहीं गायब हो जाए, कुछ दिन पहले पढने को मिला था ओजोन परत में हुआ छिद्र पुनः ओजोन यूक्त हो रहा है कितनी सच्चाई है ये वैज्ञानिक पुष्टि करेंगे, परंतु ये तमाम चीजें आम जनसमुदाय को समझना आवश्यक है कि हम अपने भौतिक सुख सुविधा के लिए कितने खतरनाक चीजों के उपयोग को बढावा दिए हैं बच्चे सदियों से पढते आ रहे है कि फ्रिज, एसी, प्रकृति में सीएफसी गैस प्रवाहित करती है जो ओजोन परत को नुकसान पहुंचाया है और तापमान निरंतर बढा है विकिपीडिया के अनुसार "क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) एक कार्बनिक यौगिक है जो केवल कार्बन, क्लोरीन, हाइड्रोजन और फ्लोरीन परमाणुओं से बनता है। सीएफसी का इस्तेमाल रेफ्रिजरेंट, प्रणोदक (एयरोसोल अनुप्रयोगों में) और विलायक के तौर पर व्यापक रूप से होता है।ओजोन निःशेषण में इसका योगदान देखते हुए, सीएफसी जैसे यौगिकों का निर्माण मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया गया है। सीएफसी के द्वारा ओजोन परत को नुकसान होता हैंं"
इस बात को हर बच्चा बच्चा जानता है वो निबंध लिखा है मगर वो आज वो जानबूझकर एसी के बिना रह नहीं सकता, फ्रिज के बिना रह नहीं सकते,
तो गलती कौन कर रहा है
क्या उत्पादक , नहीं, किसी वस्तु का निर्माण विज्ञान ही करता है लेकिन विज्ञान द्वारा निर्मित उस वस्तु का उपयोग तब संभव होता है जब उसे समाज और जनसमुदाय के द्वारा हरी झंडी मिल जाती है अर्थात लोग ऊसका अत्यधिक उपयोग करने लग जाते हैं और एक व्यापार चल पडता है ...
ओह देर हो रही है आगे कभी और...

धन्यवाद, सप्रेम साहेब बंदगी...

छत्तीसगढ़ की लोककला, कविता और आज

*छत्तीसगढ़ की लोककला, कविता और आज*
- उमराव सिंह

कल ही की बात है मुझे छत्तीसगढ़ी गीत सुनने का मन हुआ और जैसे ही शुरु किया "तै बिलासपुरहीन अऊ मैं रायगढीया" तो पास में एक युवक ने तत्काल ये कहा कि "बंद करो, मुझे छत्तीसगढ़ी गाना पसंद नहीं है भद्दे भद्दे गाना गाते हैं और हमेशा छत्तीसगढ़ को पिछड़ा दिखाते हैं" ये उसका शिकायत था फिर मैने उनको ये गीत पुरा सुनाया फिर और लगभग एक घण्टे तक छत्तीसगढ़ के पुराने गीतों का पिटारा खोला और उन्हें सुनने को कहा
- कांटा खुटी के बिनइया..
- पता ले जा रे गाडीवाला
- मोर संग चलौ रे
- झुल तरी बेलन

और इसी तरह के सोनहा बिहान और चंदैनी गोंदा के समय के प्रसिद्ध और मधुर छत्तीसगढ़ी गीतों को जब वो सुना तो थोडी देर के लिए भावविभोर हो गया...

वास्तव में छत्तीसगढ़ की लोककला और संगीत ने ही छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति को संरक्षित रख पाया है अन्यथा आज के बच्चों में अपनी ही संस्कृति के प्रति सम्मान नहीं है जो या तो अज्ञानवश है या आजकल के भद्दे गीतों और कविताओं को सुनकर उसका मन उब गया है आज ऐसे ऐसे गीत है जिसे परिवार के साथ या अपने से बडों के साथ सुनने में शर्म आ जाए,
लेकिन अधर्म का उम्र लम्बा नहीं होता, जो गीत सम्मानित समाज के बीच पसंद नहीं किया गया वो कहीं न कहीं सिमट कर रह गया

लेकिन जो गीत और संगीत पुरे सम्मान के साथ अपनी संस्कृति को प्रस्तुत किए हैं वो आज भी उसी सम्मान के साथ सुने जाते हैं देखे जाते हैं गुनगुनाएं जाते हैं...
- मंगनी मा मांगे मया नई मिले जी मंगनी म
-झुलतरी गेंदा, इंजन गाडी सेम्हर फुलगे...

वो महान नाम हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ के संस्कृति को एक संस्था के माध्यम से मंच प्रदान किया और छत्तीसगढ़ की मिट्टी की वास्तविक दृश्य के लिए दर्शक तैयार किया, स्व. दाऊ रामचंद्र देखमुख , स्व. दाऊ महासिंह चंद्राकर, दाऊ दुलार सिंह मंदराजी, स्व.केदार यादव, श्री कुलेश्वर ताम्रकार जी, और अनेक नाम हैं जो छत्तीसगढ़ की संस्कृति  को कम से कम अभी के युवापीढ़ी और बच्चों को जानने समझने के लिए मंच के माध्यम से प्रस्तुत कर दिए हैं अन्यथा आज के बुजुर्ग भी बच्चों को कहानी सुनाना छोड दिए हैं या बच्चे ही रूचि नहीं लेते..

इसी तरह आज के नए जमाने के जो गीतकार हैं कवि हैं संगीतकार हैं गायक गायिका हैं उन्से विनम्र निवेदन है कि गीत या कविता ऐसा लिखिए, ऐसा गाइए कि लोग सम्मान पूर्वक अपने परिवार और आसपास के लोगों के साथ देख सके, सुन सके... इसी तरह आज के बहुत से कवियों के कविताओं में धर्मपत्नी के ऊपर बहुत से टिप्पणी भरा कविता लिखी और सुनाई जाती है
ये नारी सशक्तीकरण का सपना संजोए हुए समाज के सामने महिलाओं के प्रति टिप्पणीयों से भरी हुई कविताएं क्या उचित है ?  जिसको मंच पर कविता है कह कर बडी आसानी से बोल दिया जाता है और सुन लिया जाता है और हस के निकल लेते हैं ऐसे ही पति के ऊपर मजाकिया टिप्पणी भरा कविताएं आज बहुत है क्या पती पत्नी का रिश्ता केवल कविताओं में मजाक बनाने के लिए है ?

आपको नहीं आता है तो मत लिखिए, आपको नहीं आता है तो मत गाइए मगर कृपा करके अपनी संस्कृति को बरबाद मत कीजिए,
और भी बहुत से विषय है लिखने के लिए, जो अनेक समस्याओं के प्रति ध्यानाकर्षित करते हों, जो आने वाले पीढी के लिए शिक्षाप्रद हो, ऐसा कविता लिखिए...
स्व.श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी केवल एक कविता से फैमस हो गए जबकि वो फैमस होने के लिए नहीं लिखे थे... याद होगी,
पुष्प की अभिलाषा..
मुझे तोड लेना ऐ वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेक, जिस पथ पर जाए वीर अनेक...

धन्यवाद

शराब एक सामाजिक विकृति

"Wine is a Social Dysnomia"
"शराब एक सामाजिक विकृति"
                   - उमराव सिंह

प्रस्तावना एवं अर्थ :- आपने एक शब्द "डिसॉर्डर" सुने और पढें हैं विज्ञान में डिसॉर्डर एक शारीरिक विकृति है डिसॉर्डर जैसा ही फिजियोलॉजी में  एक शब्द Dysnomia डिस्नोमिया है जिसमें जब दिमाग ठीक से काम नहीं करता, या किसी चीज को याद रखने की क्षमता कम हो जाती है अर्थात मानसिक विकृति ऐसे ही शराब एक सामाजिक डिस्नोमिया बन चुका है या सामाजिक बुराई कह सकते हैं । जिस तरह शरीर को बिमारियां लगती है वैसे ही समाज को भी बीमारियां लगती है नशा, दहेज, हिंसा, मांसाहार ये सब सामाजिक बिमारियां है जिसे सोशल डिस्नोमिया कह सकते हैं ।

परिभाषा :- मानव समुदाय में व्याप्त वह नकारात्मक तत्व जो समाज की व्यवस्था को विकृत कर देती है और मनुष्य की सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है। और उसकी सत्य को पहचानने की क्षमता एवं चिंतन करने की क्षमता कमजोर पड जाती है या नैतिक शिक्षा की कमी से विकसित ही नहीं हो पाती ।

विवेचना :- कल शराब शुरू हुआ और लम्बी लाइन भी लग गई, दिनभर फेसबुक में शराब के विरोध और शराबबंदी की मांग की हजारों आवाज उठी है लोग सोशल मिडिया में भर भर के शराब का विरोध किए, मगर शराब नहीं रूका, जिसको बेचना है बेच लिया जिसको पीना है पी लिया,
आज का समय कोरोना के कारण खतरनाक है ये बात लगभग सभी जानते हैं जिसके हाथ में मोबाइल है सोशल मीडिया है और जो टीवी के सामने बैठा है वो जानता है कि अभी कोरोना अत्यंत खतरनाक है लेकिन क्या वो आदमी भी उस लाइन में नहीं खडा है जो सबकुछ जानता है ? जब वो जानबूझकर लाइन में खडा है तो जो नहीं जानता वो किसी को क्यों महत्व देंगे...
इसमें बात केवल समझ की है
जो शराब के लिए लाइन में खडा उसको स्वयं के सम्मान की चिंता नहीं है उसको कोई फर्क नहीं पडता कि शराब लेते चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे, इस सम्मान का परवाह रहता तो वह खरीदने ही क्यों जाता,
शराबबंदी करो, हम पुरजोर विरोध करते हैं, ये गलत हो रहा है ऐसी ऐसी बातें केवल फेसबुक में लिख देने से क्या शराब बंद हो जाएगी।
आज कोरोना है इसलिए शराब के विरोध में आवाजें उठी हैं क्या इससे पहले किसी ने विरोध किया ?
मात्र हाथ जोडकर निवेदन करने से सुधार नहीं होता, उसके लिए कर्म करना पडता है
आज हमें ये चिंतन करने की जरूरत है कि शराब लोगों के दिमाग से कैसे निकले,
 दुध देने वाली गाय को कोई जंगल में छोड कर नहीं आता, शराब दुध दे रही है जिस दिन दुध देना बंद कर देगा उस दिन शराब स्वतः खतम हो जाएगा मतलब जिस दिन लोग शराब खरीदना बंद कर देंगे उस दिन स्वतः शराब का हौसला टुट जाएगा
 शराब के लिए जो लम्बी लाइन लगी हुई है उसका कारण शिक्षा की कमी है उसका कारण उसमे समझ की कमी है उसका कारण अपने सम्मान की चिंता की कमी है
केवल नाम गांव लिखने आ जाने से आदमी समझदार नहीं हो जाता, केवल साक्षरता को बढाने से समझदारी नहीं आएगी, लोगों में वास्तविक नैतिक शिक्षा का होना आवश्यक है
केवल नैतिक शिक्षा ही ऐसा हथियार है जिससे मानव समाज शराब को स्वतः छोड देगा फिर किसी आंदोलन की जरूरत नहीं पडेगी,
आज शराब इसलिए बिका है क्योंकि लाखों लोग इस खतरनाक समय में भी लाइन में लगकर शराब खरीदना पीना को गलत नहीं समझे हैं मतलब उसके दिमाग में इतनी समझ नहीं है कि हम शराब ना खरीदे,
तो ये सोचिए कि ऐसा स्थिति कैसे पैदा हो कि एक आदमी का हृदय शराब खरीदने की गवाही ना दे... और जो पीढी आज शराब की लाइन में खडी है वो अपने सम्मान के प्रति जागरूक कैसे हो,
शराब एक सामाजिक बुराई है क्योंकि ये लोगों की बहुत बडी संख्या के बीच अपना स्थान बना चुका है लोग जो अत्यंत शिक्षित हैं वो भी शराब पी रहे हैं जो नहीं पढे लिखें हैं वो भी पी रहे हैं तो यह एक व्यापक रूप से फैला हुआ सामाजिक बीमारी है और इसको बंद करने की मांग करना मतलब सामाजिक परिवर्तन की मांग करना है और कोई भी सामाजिक परिवर्तन एकाएक तत्काल नहीं होता उसके लिए जागरूक होना पडता है
अब ये सोचिए कि आज शराब के लाइन में खडे हुए लोगों में यह जागरूकता कैसे ला सकते हैं
इसमें जितना दोषी शराब बेचने वाला है उससे बडा अपराधी है शराब खरीदने वाला,
 वास्तविक दोषी वही है जो लाइन में खडा है शराब के लिए..
एक समय समाज में सती प्रथा एक बहुत बडी सामाजिक बुराई था जरा सोचिए राजा राम मोहन राय को उस समय सती प्रथा को बंद करने के लिए उस समय की परिस्थिति में कैसी परिस्थिति का सामना करना पडा होगा, उस समय के कुंठित मानसिकता ने क्या राजा राममोहन राय का विरोध नहीं किया होगा ? बिल्कुल किया होगा, और समय के साथ सती प्रथा का अंत हुआ, ऐसे ही शराब का भी अंत होगा, निश्चित रूप से होगा... बस इसे खतम करने का सही तरीका अपनाना होगा। हां, परंतु अभी वर्तमान की स्थिति में सरकार द्वारा ही मधुशालाओं को  बंद रखने का शख्त हिदायत होना चाहिए।

उपाय जिससे दुरगामी सुधार होगा
1. सामाजिकरण
2. नैतिक शिक्षा : मशीनी शिक्षा ने आज युवाओं अपने समाज, धर्म के महत्व को नगण्य बना दिया है हर सुविधा के लिए बडा बडा मशीन बनाने की होड में लोग समाज, नातेदारी का महत्व को भूलते जा रहे हैं विवाह, परिवार एक सामाजिक व्यवस्था का प्रकार्यात्मक अंग है परंतु आज परिवार विवाह केवल औपचारिकता बनता जा रहा है इसका कारण है नैतिक शिक्षा की नितांत कमी, और केवल साक्षरता दर बढाने का उद्देश्य
3. रोजगार की सही परिभाषा विकसित होना क्योंकि आज लोग पढाई करने का अर्थ केवल नौकरी पाना समझते हैं और वास्तव में आज केवल नौकरी पाने के लिए लोग पढाई कर रहे हैं पढाई करके खेत में काम करना सब अपने स्टेटस के लिए खराब समझते हैं जबकि ऐसा नहीं है शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य केवल उचित और अनुचित को समझना है । मात्र नौकरी पाना नहीं ।

(किसी गलती पर सुझाव अवश्य देवें, यह मेरा मौलिक लेख है)

- उमराव सिंह

सेमीनार से वेबीनार की ओर

सेमिनार से वेबिनार की ओर : उत्तर आधुनिक काल
                      - उमराव सिंह
गहन रूप से उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे लोग ही सेमिनार को जानते थे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में किसी विषय पर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार होते रहता है जिसमें अनुसंधान करने वाले छात्र अपने शोधपत्र प्रस्तुत करते हैं कुछ समय से कुछ राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय बिजनेस कंपनियां अपने उत्पादन के प्रचार या लोगों को अपने बिजनेस से जोडने के लिए सेमिनार के आयोजन का दौर चला, न्यूज पेपर के पाठक व पठन पाठन में रूचि रखने वाले कुछ आमजन सेमिनार शब्द से परिचित रहे हैं और अंदर चलें तो ग्रामीण समुदाय जनसमुदाय और शहरों के भी बहुत बडी जनसंख्या इस शब्द से बिल्कुल अनभिज्ञ रहा है सेमिनार शब्द की बात करो तो कुछ लोग वो सब्जी वाली सेमी का नार कहकर मजाक भी उडा देते हैं
अब उत्तर आधुनिक संचार क्रांति ने एक नया शब्द से परिचित कराया है वेबिनार।
वेबिनार हाल ही में कुछ हफ्तों महिनों से उपयोग में आने वाला एक शब्द है जिसमें वेब या कम्प्यूटर के द्वारा आनलाईन बातें होती है जिसको वीडियो कॉन्फ्रेंस भी कहते हैं यदि किसी विषय पर विडिओ कॉन्फ्रेंस के द्वारा बातें हुई तो वह इलेक्ट्रॉनिक मिडिया में संपूर्ण जनसंख्या के सुनने के लिए सुरक्षित भी कर लिया जाता है तो जहाँ सेमिनार में अधिकतम चार पांच सौ लोग वक्ताओं को सामने से सुन पाते थे आज पुरी दुनिया सुन रहा है देख रहा है इंटरनेट के माध्यम से..
वैश्वीकरण की उपज इस शब्द से आम जनसमुदाय कब परिचित होगा, खेतिहर मजदूर इससे कब परिचित होगा  जब वो वेबिनार के पूर्वज सेमिनार से ही परिचित नहीं है... उत्तर आधुनिक काल वह है जब से संचार क्रांति हुई, और इससे पहले का समय जब औद्योगिकरण हुआ वह आधुनिक काल था  तो एक ही समय जहाँ एक वर्ग उत्तर आधुनिक युग में जी रहा है उस समय पर बहुत बडी जनसंख्या अभी तक आधुनिक काल में ही है
इससे आगे और चले तो आज भी एक बहुत बडी जनसंख्या आदिम युग में जी रहा है आप जानते हैं जिसको सरकार ने विशेष पिछडी जनजाति का दर्जा दिया है ये आज वेबिनार के समय में आदिम युग में जी रहे हैं छत्तीसगढ़ में भी ऐसे पांच जनजातीयां चिन्हांकित हैंं पहाडी कोरवा, बैगा, कमार, अबुझमाडिया और बिरहोर, ये तो रही बात हमारे छत्तीसगढ़ की..
अफ्रीका में आदिम जनजातियां, अंडमान निकोबार की ओंगे, सैंटेननिलिस, जारवा
ये वो जनजातियां हैं जो आज भी शिक्षा से परिचित नहीं है तो सेमिनार और वेबिनार से परिचित कब होगा....

- उमराव सिंह

शनिवार, 9 मई 2020

जेठ की ठंडी हवाएँ

जेठ की ठंडी हवाएं...
-उमराव सिंह

हल्की बारीश हो गई और बारिश के बाद की गुलाबी हवाओं की सुगंध से आप वाकिब हैं लेकिन सोचने वाली बात ये है कि ये ज्येष्ठ का महिना है वो जेठ जिसमें चिलमिलाती धुप पडती थी जेठ के महिने में ऐसी ठंडी हवाओं की कल्पना प्रेमचंद की पुस की रात से ठीक विपरीत है क्योंकि पूस की रात की कडकडाती ठंड और जेठ की चिलमिलाती धुप से सब परिचित हैं मगर कल शाम को बल्ब और ट्यब लाइट के नीचे अत्यधिक संख्या में कुछ किडे पतंगें उड रहे थे जिसे हमारे बेमेतरा क्षेत्र में बत्तर किरा कहते हैं बुजुर्ग किसान जो जीवन भर जमीन पर अन्न उगाते आए हैं वो इन पतंगों को बरसात का संकेत मानते हैं इन पतंगों को बरसात का संकेत माना जाता है और ये पतंगें उस स्थिति में दिखाई पडते हैं जब किसान अपनी खेती की शुरुआत कर रहे होते हैं मुझे अच्छे से याद है पहले स्कूल जुलाई में खुलता था यह जुलाई बरसात का मौसम होता था और हम बच्चे आंगन में बैठे पढाई करते थे तो ये पतंगे आसपास उडने के बाद उनके खुब सारे पंख टुट कर गिरे रहते थे  ये किडे न जाने क्यों केवल बरसात में ही दिखाई पडता था वो भी केवल दो चार दिन... फिर कहीं गायब...
इस बात को लिखने का कारण ये है कि मई जून यानि हिन्दी का बैशाख ज्येष्ठ का महिना, भयानक गर्मी, तापमान 26-47℃ तक पहुंच रहा था रोड में गन्ना रस, बर्फ गोला, आइसक्रीम और कोल्डड्रिंक की कतारें होनी पडती थी
अब जरा सोचे जेठ के महिने में आज ठंडी हवाएं, कुछ देर बारिश के बाद फिर से धुप, बत्तर किडा, और सुबह तो फाफा भी दिखा...  ये सब संकेत है जलवायु परिवर्तन का.. जो अब स्थाई होता जाएगा, अब आने वाले जलवायु के अनुसार फसल चक्र भी परिवर्तित होना होगा,  मौसमी गीतों में वो पहले जैसा अनुभव नहीं होगा बल्कि सावन में गर्मी का अनुभव होगा, बरसात और ठंड का मौसम आगे के महिनो में खिसकने लग रहा है...
मौसम और जलवायु में अंतर तो सब पढे ही हैं मौसम वो है जो तेजी से परिवर्तित होता है जैसे एक ही दिन में सुबह धुप और शाम को बारिश। और जलवायु लगभग 30 साल में परिवर्तित होती है इसीलिए आज से तीस साल पहले जिस तरह का बरसात, ठंड और गर्मी का महिना हुआ करता था वो अब काफी परिवर्तित हो चुका है पिछले तीस साल पहले जैसा जलवायु अभी नहीं है... जैसे झडी, आज के बच्चे तो झडी क्या है इसको नहीं जानते झडी उसे कहते थे जब एक हफ्ते पंद्रह दिन तक लगातार पानी गिरते रहता था हफ्तों हफ्तों सुर्य दिखाई नहीं देता था । पहले जैसा जलवायु का कुछ अंश भी अभी चाहिए तो उसके लिए बहुत बडे पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा, पलायन छोडकर खेती की ओर बढना ही होगा, यदि ठान लें इतनी बडी आबादी के लिए बडी बात नहीं है एक आदमी अपने नाम से एक पेड लगाए तो भी सवा अरब पेड होता है... जलवायु परिवर्तन...

- उमराव सिंह