Culture and environment

सोमवार, 11 मई 2020

सेमीनार से वेबीनार की ओर

सेमिनार से वेबिनार की ओर : उत्तर आधुनिक काल
                      - उमराव सिंह
गहन रूप से उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे लोग ही सेमिनार को जानते थे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में किसी विषय पर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार होते रहता है जिसमें अनुसंधान करने वाले छात्र अपने शोधपत्र प्रस्तुत करते हैं कुछ समय से कुछ राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय बिजनेस कंपनियां अपने उत्पादन के प्रचार या लोगों को अपने बिजनेस से जोडने के लिए सेमिनार के आयोजन का दौर चला, न्यूज पेपर के पाठक व पठन पाठन में रूचि रखने वाले कुछ आमजन सेमिनार शब्द से परिचित रहे हैं और अंदर चलें तो ग्रामीण समुदाय जनसमुदाय और शहरों के भी बहुत बडी जनसंख्या इस शब्द से बिल्कुल अनभिज्ञ रहा है सेमिनार शब्द की बात करो तो कुछ लोग वो सब्जी वाली सेमी का नार कहकर मजाक भी उडा देते हैं
अब उत्तर आधुनिक संचार क्रांति ने एक नया शब्द से परिचित कराया है वेबिनार।
वेबिनार हाल ही में कुछ हफ्तों महिनों से उपयोग में आने वाला एक शब्द है जिसमें वेब या कम्प्यूटर के द्वारा आनलाईन बातें होती है जिसको वीडियो कॉन्फ्रेंस भी कहते हैं यदि किसी विषय पर विडिओ कॉन्फ्रेंस के द्वारा बातें हुई तो वह इलेक्ट्रॉनिक मिडिया में संपूर्ण जनसंख्या के सुनने के लिए सुरक्षित भी कर लिया जाता है तो जहाँ सेमिनार में अधिकतम चार पांच सौ लोग वक्ताओं को सामने से सुन पाते थे आज पुरी दुनिया सुन रहा है देख रहा है इंटरनेट के माध्यम से..
वैश्वीकरण की उपज इस शब्द से आम जनसमुदाय कब परिचित होगा, खेतिहर मजदूर इससे कब परिचित होगा  जब वो वेबिनार के पूर्वज सेमिनार से ही परिचित नहीं है... उत्तर आधुनिक काल वह है जब से संचार क्रांति हुई, और इससे पहले का समय जब औद्योगिकरण हुआ वह आधुनिक काल था  तो एक ही समय जहाँ एक वर्ग उत्तर आधुनिक युग में जी रहा है उस समय पर बहुत बडी जनसंख्या अभी तक आधुनिक काल में ही है
इससे आगे और चले तो आज भी एक बहुत बडी जनसंख्या आदिम युग में जी रहा है आप जानते हैं जिसको सरकार ने विशेष पिछडी जनजाति का दर्जा दिया है ये आज वेबिनार के समय में आदिम युग में जी रहे हैं छत्तीसगढ़ में भी ऐसे पांच जनजातीयां चिन्हांकित हैंं पहाडी कोरवा, बैगा, कमार, अबुझमाडिया और बिरहोर, ये तो रही बात हमारे छत्तीसगढ़ की..
अफ्रीका में आदिम जनजातियां, अंडमान निकोबार की ओंगे, सैंटेननिलिस, जारवा
ये वो जनजातियां हैं जो आज भी शिक्षा से परिचित नहीं है तो सेमिनार और वेबिनार से परिचित कब होगा....

- उमराव सिंह

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