सोमवार, 11 मई 2020

छत्तीसगढ़ की लोककला, कविता और आज

*छत्तीसगढ़ की लोककला, कविता और आज*
- उमराव सिंह

कल ही की बात है मुझे छत्तीसगढ़ी गीत सुनने का मन हुआ और जैसे ही शुरु किया "तै बिलासपुरहीन अऊ मैं रायगढीया" तो पास में एक युवक ने तत्काल ये कहा कि "बंद करो, मुझे छत्तीसगढ़ी गाना पसंद नहीं है भद्दे भद्दे गाना गाते हैं और हमेशा छत्तीसगढ़ को पिछड़ा दिखाते हैं" ये उसका शिकायत था फिर मैने उनको ये गीत पुरा सुनाया फिर और लगभग एक घण्टे तक छत्तीसगढ़ के पुराने गीतों का पिटारा खोला और उन्हें सुनने को कहा
- कांटा खुटी के बिनइया..
- पता ले जा रे गाडीवाला
- मोर संग चलौ रे
- झुल तरी बेलन

और इसी तरह के सोनहा बिहान और चंदैनी गोंदा के समय के प्रसिद्ध और मधुर छत्तीसगढ़ी गीतों को जब वो सुना तो थोडी देर के लिए भावविभोर हो गया...

वास्तव में छत्तीसगढ़ की लोककला और संगीत ने ही छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति को संरक्षित रख पाया है अन्यथा आज के बच्चों में अपनी ही संस्कृति के प्रति सम्मान नहीं है जो या तो अज्ञानवश है या आजकल के भद्दे गीतों और कविताओं को सुनकर उसका मन उब गया है आज ऐसे ऐसे गीत है जिसे परिवार के साथ या अपने से बडों के साथ सुनने में शर्म आ जाए,
लेकिन अधर्म का उम्र लम्बा नहीं होता, जो गीत सम्मानित समाज के बीच पसंद नहीं किया गया वो कहीं न कहीं सिमट कर रह गया

लेकिन जो गीत और संगीत पुरे सम्मान के साथ अपनी संस्कृति को प्रस्तुत किए हैं वो आज भी उसी सम्मान के साथ सुने जाते हैं देखे जाते हैं गुनगुनाएं जाते हैं...
- मंगनी मा मांगे मया नई मिले जी मंगनी म
-झुलतरी गेंदा, इंजन गाडी सेम्हर फुलगे...

वो महान नाम हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ के संस्कृति को एक संस्था के माध्यम से मंच प्रदान किया और छत्तीसगढ़ की मिट्टी की वास्तविक दृश्य के लिए दर्शक तैयार किया, स्व. दाऊ रामचंद्र देखमुख , स्व. दाऊ महासिंह चंद्राकर, दाऊ दुलार सिंह मंदराजी, स्व.केदार यादव, श्री कुलेश्वर ताम्रकार जी, और अनेक नाम हैं जो छत्तीसगढ़ की संस्कृति  को कम से कम अभी के युवापीढ़ी और बच्चों को जानने समझने के लिए मंच के माध्यम से प्रस्तुत कर दिए हैं अन्यथा आज के बुजुर्ग भी बच्चों को कहानी सुनाना छोड दिए हैं या बच्चे ही रूचि नहीं लेते..

इसी तरह आज के नए जमाने के जो गीतकार हैं कवि हैं संगीतकार हैं गायक गायिका हैं उन्से विनम्र निवेदन है कि गीत या कविता ऐसा लिखिए, ऐसा गाइए कि लोग सम्मान पूर्वक अपने परिवार और आसपास के लोगों के साथ देख सके, सुन सके... इसी तरह आज के बहुत से कवियों के कविताओं में धर्मपत्नी के ऊपर बहुत से टिप्पणी भरा कविता लिखी और सुनाई जाती है
ये नारी सशक्तीकरण का सपना संजोए हुए समाज के सामने महिलाओं के प्रति टिप्पणीयों से भरी हुई कविताएं क्या उचित है ?  जिसको मंच पर कविता है कह कर बडी आसानी से बोल दिया जाता है और सुन लिया जाता है और हस के निकल लेते हैं ऐसे ही पति के ऊपर मजाकिया टिप्पणी भरा कविताएं आज बहुत है क्या पती पत्नी का रिश्ता केवल कविताओं में मजाक बनाने के लिए है ?

आपको नहीं आता है तो मत लिखिए, आपको नहीं आता है तो मत गाइए मगर कृपा करके अपनी संस्कृति को बरबाद मत कीजिए,
और भी बहुत से विषय है लिखने के लिए, जो अनेक समस्याओं के प्रति ध्यानाकर्षित करते हों, जो आने वाले पीढी के लिए शिक्षाप्रद हो, ऐसा कविता लिखिए...
स्व.श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी केवल एक कविता से फैमस हो गए जबकि वो फैमस होने के लिए नहीं लिखे थे... याद होगी,
पुष्प की अभिलाषा..
मुझे तोड लेना ऐ वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेक, जिस पथ पर जाए वीर अनेक...

धन्यवाद

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