बुधवार, 1 जुलाई 2020

दसवीं या बारहवीं के बाद क्या करें। #Carrier_Counseling, #कैरियर_परामर्श, कैरियर काउंसलिंग,

#कैरियर_काउंसलिंग ( कैरियर परामर्श ) Carrier Counseling


#कैरियर काउंसलिंग ( कैरियर परामर्श ) #Carrier Counseling (नया संस्करण)

अक्सर दसवीं और बारहवीं बायोलॉजी, गणित, कॉमर्स, कृषि और कला के बाद बच्चे और पालक ये सोचने लग जाते हैं कि आगे क्या करें ? तो इन सभी संकायों में भविष्य का एक मार्गदर्शन...

*#12th_बायोलॉजी_के_बाद_क्या_करें 
1. बारहवीं बायोलॉजी के बाद आप मेडिकल, डेन्टल, फॉर्मेसी, नर्सिंग, कृषि के क्षेत्र में पढाई करने के लिए इनके प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर सकते हैं
2. यदि आप किसी प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी नहीं करना चाहते तो फोरेंसिक साइंस बहुत अच्छे इन्ट्रेस्टिंग विषय है जिसमें बहुत अच्छा भविष्य है । इससे आप फोरेंसिक एक्सपर्ट बन सकते हैं।
3. बायोलॉजी वाले आगे माइक्रोबायोलॉजी, रसायन, जूलॉजी, बॉटनी में बी.एस.सी., एम.एस.सी. करके पीएचडी तक पहूंच सकते हैं और आगे प्रोफेसर या वैज्ञानिक बन सकते हैं।
4. बायोलॉजी के क्षेत्र में गहन पढाई करके ICMR और अनेक रिसर्च संस्थाओं से रिसर्च से संबंधित अनेक पद आते रहते हैं।
5. पर्यावरण, जैवविविधता एवं संरक्षण, बायोटेक्नोलॉजी, पशु चिकित्सा आदि से संबंधित संस्थाओं में में रोजगार कै अवसर रहते हैं।
6. यदि प्रशासन में जा कर कलेक्टर आदि बडे बडे पद में जाने की रुचि हो तो ग्रेजुएशन के साथ साथ विविध प्रशासनिक पदों की तैयारी किसी जानकार व्यक्ति या कोचिंग के सलाह से कर सकते हैं और ग्रेजुएशन होते ही पीएससी या आईएएस के लिए परीक्षा में बैठ सकते हैं।

लेकिन जो भी करें अपनी रूचि और उसमें भविष्य में रोजगार के अवसर को ध्यान में रखकर करें । जिसमें हमारी रूचि हो उसी क्षेत्र में आगे बढना चाहिए। और पालक भी अपने बच्चे की तुलना दुसरे के बच्चे के साथ ना करें, सब की अपनी अपनी रूचि और क्षमता होती है। और सब में एक प्रतिभा होती है उस प्रतिभा को आगे बढने दें।

*बारहवीं गणित के बाद*
गणित में बारहवीं पास करने के बाद आप फिजिक्स की गहन पढाई कर सकते हैं फिजिक्स में बहुत अच्छा कैरियर है ऐसे कम्प्यूटर साइंस भी अच्छा विकल्प है
भूगर्भशास्त्र (जियोलॉजी ) में बहुत अच्छा कैरियर है इससे आप आगे जीयोलॉजीस्ट बन सकते हैं।
BCA बारहवीं के बाद बैचलर आफ कम्प्यूटर साइंस करके आगे MCA एम.सी.ए. कर सकते है आज कम्प्यूटर के क्षेत्र में अत्यधिक रोजगार के अवसर है ऐसे ही कमप्यूटर में DTP, Hardware maintainance जैसे क्षेत्रों में स्वरोजगार भी स्थापित किया जा सकता है।
गणित के बच्चे विभिन्न इंजीनियरिंग संबंधी प्रतियोगिता परीक्षाओ जैसे PET, IIT आदि के माध्यम से इंजीनियरिंग के बडे बडे पद पर पहुंचा जा सकता है बशर्ते पढाई सिरियसली होना चाहिए, कामचलाऊ नहीं। इसमें पीडब्ल्यूडी, सिविल इंजीनियरिंग, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, सॉफ्टवेयर इंजीनियर और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अपना भविष्य बना सकते हैं। इंजीनियरिंग में आप इलेक्ट्रॉनिक्स टेलीकम्युनिकेशन को एक अच्छा विकल्प के रूप चुन सकते हैं इससे आपको सुरक्षा क्षेत्र, इंटेल कंपनी, HAL, IAF, Navy, BSNL, AAI, DRDO, ISRO,  NASA  आदि क्षेत्रों में अपना भविष्य बना सकते हैं। इससे आप आगे पी.एच.डी. करके वैज्ञानिक तक पहूंच सकते हैं।

 *बारहवीं कला ( Arts ) के बाद*
इससे संबंधित विषयों जैसे इतिहास, भूगोल, हिन्दी साहित्य, समाजशास्त्र आदि क्षेत्रों में इनसे संबंधित कार्य वाले संस्थाओं में रोजगार के अवसर होते हैं पर इन विषयों  में कैरियर तभी है जब बहुत अच्छी पढाई किया जाए, विषय में पकड अच्छी हो । इन विषयों में स्नातक, स्नातकोत्तर करते हुए भी प्रशासन में जा सकते हैं या इन विषयों के प्रोफेसर या अनेक संस्थाओं में रोजगार के अवसर होते हैं। पर पढाई कामचलाऊ नहीं होना चाहिए, यदि पढ रहे हैं तो वास्तव में पुस्तक पढकर संबंधित जानकारियों को दिमाग में होना चाहिए, पतली पतली गाइड पढ के अपनी मंजिल तक नहीं पहूंच सकते ।

इसलिए जो भी पढाई करें अपनी रुचि और कैरियर को ध्यान में रखकर अच्छी पढाई करें।

मास कम्युनिकेशन के क्षेत्र में भी आज रोजगार के अवसर है बहुत से विश्वविद्यालयों में इसकी पढ़ाई हो रही है।

*12th कॉमर्स के बाद*
कॉमर्स के क्षेत्र में बहुत अच्छा भविष्य है इससे आप सी.ए. चार्टर्ड अकाउंटेंट जिसका आज अत्यधिक जरूरत पडती है कर सकते हैं बिजनेस के क्षेत्र से संबंधित संस्थाओं में रोजगार के अवसर हैं । इसमें आप बी.कॉम, बी.कॉम ऑनर्स, एम. कॉम, एम.कॉम, ऑनर्स, सी.ए, सी.एस.,  एम.बी.ए., और सी.एफ.ए. करके अपना भविष्य बना सकते हैं। कम्प्यूटर में Tally की तैयारी अच्छा विकल्प है।

*12th कृषि के बाद*
एग्रीकल्चर का सदैव आवश्यकता है इसलिए इसके शिक्षा क्षेत्र में सदैव रोजगार के अवसर हैं इसके लिए PAT, ICAR की कोचिंग करके प्रतियोगिता परीक्षाओं के द्वारा कृषि में स्नातक व स्नातकोत्तर कर सकते हैं आगे इसमें कृषि वैज्ञानिक और प्रोफेसर तक पहूंचा जा सकता है। कृषि से संबंधित रिसर्च संस्थाओं में रोजगार के अवसर हैं। कृषि संबंधी विभागों में रोजगार के अवसर होते हैं।

 *प्रशासनिक सेवा के लिए* 
बहुत से बच्चे और पालक चाहतें हैं कि वे प्रशासन में जाकर कुछ बडे पद  जैसे कलेक्टर आदि का पद प्राप्त करें, इसके लिए सबसे आसान तरीका है कि आप किसी विषय में स्नातक (ग्रेजुएशन) कीजिए और साथ साथ पीएससी या यूपीएससी की कोचिंग कर सकते हैं तो तीन साल स्नातक के साथ साथ पीएससी की बहुत अच्छी तैयारी हो जाती है। और जैसे ही स्नातक हुआ आप पीएससी की परीक्षाओं में बैठ सकते हैं। ऐसे ही अन्य पदों पर रोजगार के लिए एकाग्रता पूर्वक तैयारी कर सकते हैं शिक्षा, स्वरोजगार स्थापित करने योग्य भी होना चाहिए।

 *संगीत शिक्षा* 
जो बच्चे संगीत, पेंटिंग या डिजाइनिंग में रूचि रखते हैं उन्हें अपने रूचि के अनुसार संगीत विश्वविद्यालय के द्वारा संगीत, पेंटिंग या डिजाइनिंग की पढाई भी कर सकते हैं। 
संगीत संबंधित संस्थाओं में इनमें भी रोजगार मिलते हैं।

तो दस तरफ दिमाग को नहीं फैलाते हुए केवल एक दिशा को चुनिए और उसी में आगे बढिए । जिसमें आपकी रूचि हो। बशर्ते पढाई ईमानदारी और लगन से होनी चाहिए।

शिक्षा व कैरियर संबंधी विषय पर अधिक जानकारी एवं परामर्श के लिए...

प्रकाशक एवं लेखक :
- *Umrao Singh*
    M.Sc., M.Phil. (Goldmedal)
    Social Anthropology, UGC NET
    डायरेक्टर : सिंघरौर कोचिंग एण्ड
    आई.ए.एस.एकेडमी, बेमेतरा
    Contact : umrao735@gmail.com
    Mo: 6263219281      umraosinghverma.blogspot.com

प्रकाशन दिनांक 04/07/2020
नया संस्करण
© umraosingh2020

 *शिक्षा की प्राप्ति व उसके उचित उपयोग से ही बौद्धिक संपदा को बढाई जा सकती है।*

शुक्रवार, 5 जून 2020

Destruction by nature : the necessity of Natural Revolution


Destruction by nature : the necessity of Natural Revolution 

                            - Umrao Singh

According to Marxist theory, Karlmarkes insisted that the exploitation of the exploited class establishes the dominance of the exploited class. Similarly, it is clear today that there has been a lot of exploitation of nature and it is happening.  Today man is exploitative and nature is exploited. In response to the exploited nature due to industrialization, urbanization, irregular use of facilities, today, climate change, rising temperature, cyclonic storm etc. have to face many disasters.  Today, it is very important that what kind of world are we going to give to the coming generation.  The reason for this is that man has exploited nature indiscriminately from past to present. Natural resources are heavily used. This rapid scientific revolution has filled life with facilities on the one hand, and on the other hand, the natural balance has been greatly affected, the result of which we all are seeing as climate change for some years. Today, to bring nature back to its balanced state, widespread awareness is needed, such an awareness that is spread to every person in the world through education, communication, film and all mediums, this is the natural revolution.

Relation between nature and human being : -
         Just as we are connected with our relatives and friends, we are also connected with nature.  There is also a tradition of nature worship in Indian culture, tribal culture and culture of primitive societies. Trees are worshiped in the primitive tribes of Asia, America, Africa and also in large societies. In fact, the relation of man and nature is more important and ancient than the social relations of man. A clean relationship between nature and man is essential and necessary, because life cannot be imagined without oxygen derived from nature. According to physiologist Jane Engenhaus, "photosynthesis occurs through plants that release oxygen gas."  And oxygen is indispensable for life. All such animals, including us humans, are also related to trees, because there are only trees and plants in the earth that can produce fruit. Corbohydrates, proteins, fats, vitamins and minerals are essential for our body. While grains like rice and maize are carbohydrates, gram, groundnut are proteins. There are vitamins and minerals in all fruits that establish the natural exchange between nature and man, that is, the relationship of natural transactions, it is an essential relationship. There is a need for awareness in this regard among all the people of the world.

Definition :-
         The entire awareness work done by man that balances the environment and from which all animals, plants etc. can establish adaptation with nature can be called natural revolution.

Under the natural revolution the following tasks have to be done : -
 1. Let all the people of the world plant a tree at a certain time with their hands and understand the responsibility of its maintenance.
 2. There should be a statutory initiative to stop the use of plastic and disposals.
 3. To emphasize prevention on improper use of petrol and diesel.
 4. A.C., emphasizing the planned use of the fridge.
 5. To devise measures to control the sources of noise pollution.
 6. Completely banning misuse of power and fixing monitoring system.
 7. Work on making solar energy accessible to every family.
 8. To undertake natural awareness programs by students at school, college and university level and become self aware.
 9. Promotion of natural balance research by researchers.
 10, Saint Mahatmas in their discourses appealed for awareness of nature and for plantation and to do plantation and nature work together.
 11. Print and electronic media are already broadcasting programs of natural awareness, making it functional on the ground.
 12. Governance, administration and courts prohibit all use of goods which are exploiting nature.
 13. People should be serious towards protection of water-forest-land.
 14. To motivate people by creating programs of natural awareness in films and TV programs.
         In this way, natural awareness will have to be spread to every person and nature has to be included in your dear friend or dear relatives. It means that in every way, every person should understand the importance of nature.

Forerunner of Natural Revolution : -
         For this program everyone in the world will have to work together under one model.  People can also do environmental work in their own groups or independently. In this, the government and international institutions of all countries have an important role, each person of each country. In this, participation of students, women, laborers, farmers, youth, traders is mandatory. The government and the public have to be committed to nature together. The morning air is called the medicine of lakh rupees, this very expensive medicine, which is available for free today, will have to be protected for the future.  Everyone should keep in mind that nature is a loving member of our family and its safety is our duty.



Natural Revolution : An example : -

         A program of free tea distribution is organized by about twenty of our siblings together for awareness of the side effects of disposal. Under this program, for the last five years, free tea is distributed to four thousand people in steel cups in Sant Samagam Mela for four days. Along with this, people are made aware of the side-effects caused by disposals and plastics. A poster exhibition is organized for its awareness.  And people also have a group discussion about the side effects of plastic and disposals by drinking tea in cups.
 The impact of this program has been so much that when the sudden disposal of the hands of people in this area comes to mind that it is not appropriate.  It is hazardous to health and the environment.  People are becoming aware that they absolutely refuse their children not to use disposals or plastic.  My comrades who started this program include Mr. Chitrenda Verma, Mr. Vikrant Verma, Mr. Kaushal Verma, Mr. Ashok Verma, Mr. Lalit Verma, Mr. Gandaram Varma, Mr. Prahlada Singh Varma, Mr. Satish Verma, Advocate, Mrs. Gauri Varma and this field There are about fifty youths with whose cooperation this awareness program succeeds. The work related to creating such awareness is necessary all over the world.  Natural revolution will have to be made successful by such efforts.

Article writer - Umrao Singh
Bemetara, chhattisgarh, BHARAT

 Self Publiced on blog
umraosinghverma.blogspot.com
 *05 June 2020 _ World Environment Day_

प्रकृति से विनाश : आवश्यकता प्राकृतिक क्रांति की


#प्रकृति_से_विनाश : आवश्यकता #प्राकृतिक क्रांति की
                          - उमराव सिंह

मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार कार्लमार्क्स इस बात पर जोर देते थे कि शोषक वर्ग द्वारा शोषित वर्ग पर किए गए शोषण के प्रतिक्रियास्वरूप शोषित वर्ग का आधिपत्य स्थापित होता है। इसी तरह आज स्पष्ट नजर आ रहा है कि प्रकृति का भरपूर शोषण हुआ है और हो रहा है । आज मनुष्य शोषक है और प्रकृति शोषित है । औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, सुविधाओं का अनियमित उपयोग से शोषित प्रकृति की प्रतिक्रियास्वरूप आज जलवायु परिवर्तन, बढता हुआ तापमान, चक्रवाती तूफान आदि अनेक आपदाओं से जूझना पड़ रहा है । आज ये चिंतन अत्यंत आवश्यक है कि आने वाली पीढी को हम कैसी दुनिया देने वाले हैं । इसका कारण है कि अतीत से वर्तमान तक मनुष्य ने प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग हुआ है। तेजी से हुई इस वैज्ञानिक क्रांति ने जहाँ एक ओर जीवन को सुविधाओं से परिपूर्ण किया वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संतुलन काफी प्रभावित हुआ है, जिसका परिणाम हम सभी कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के रूप में देख रहे हैं । आज पुनः प्रकृति को अपनी संतुलित अवस्था में लाने के लिए व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है, ऐसी जागरूकता जिसे शिक्षा, संचार, फिल्म और तमाम माध्यमों के द्वारा विश्व के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाई जाए, यही प्राकृतिक क्रांति है ।

प्रकृति व मनुष्य का संबंध -
        जिस प्रकार हम अपने नातेदारों, दोस्तों से जुड़े होते हैं, वैसे ही हम प्रकृति से भी जुड़े हुए हैं । भारतीय संस्कृति, जनजातीय संस्कृति और आदिम समाजों की संस्कृति में भी प्रकृति पूजा की परंपरा रही है। एशिया, अमेरिका, अफ्रीका की आदिम जनजातियों में व वृहत समाजों में भी पेड़ों की पूजा की जाती है । वास्तव में मनुष्य और प्रकृति का संबंध मनुष्य के सामाजिक संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण और प्राचीन है। प्रकृति व मनुष्य के बीच स्वच्छ संबंध अनिवार्य और आवश्यक है, क्योंकि प्रकृति से प्राप्त होने वाले ऑक्सीजन के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। शरीरक्रिया वैज्ञानिक जेन इंगेनहाउज के अनुसार "पौधों के द्वारा प्रकाश संश्लेषण होता है जिससे ऑक्सीजन गैस निकलती है।" और ऑक्सीजन जीवन के लिए अनिवार्य  है। ऐसे ही सभी जीव जन्तुओं, जिसमें हम मनुष्य भी हैं, का संबंध पेड़ों से भी है, क्योंकि धरती में केवल पेड़- पौधे ही हैं जो फल का निर्माण कर सकते हैं। हमारे शरीर के लिए आवश्यक तत्वों  कॉर्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन्स और खनिज तत्वों का निर्माण पेड़-पौधों में ही फल के रूप में होता है । जहाँ चावल और  मक्का आदि अनाज कॉर्बोहाइड्रेट है वहीं चना, मूंगफली प्रोटीन हैं । तमाम फलों में विटामिन और खनिज तत्व हैं जो प्रकृति व मनुष्य के बीच प्राकृतिक विनिमय अर्थात प्राकृतिक लेनदेन के संबंध को स्थापित करते हैं,  यह अनिवार्य संबंध है। दुनिया के तमाम लोगों में इस संबंध में जागरूकता की आवश्यकता है।

परिभाषा :-
        मनुष्य के द्वारा किए जाने वाले वे संपूर्ण जागरूकता कार्य जिनसे पर्यावरण में संतुलन स्थापित हो तथा जिनसे सभी जीव-जन्तु, पादप आदि प्रकृति के साथ अनुकूलन स्थापित कर सके उसे प्राकृतिक क्रांति कह सकते हैं।

प्राकृतिक क्रांति के तहत निम्न कार्य करने होंगे :-
1. विश्व के सभी लोग अपने हाथ से एक निश्चित समयांतराल में वृक्षारोपण करें और उसके पालन की जिम्मेदारी समझें ।
2. प्लास्टिक व डिस्पोजल का उपयोग बंद करने की वैधानिक पहल हो ।
3. पेट्रोल, डीजल के अनुचित उपयोग पर रोकथाम पर जोर देना ।
4. ए.सी., फ्रिज के नियोजित उपयोग पर जोर देना ।
5. ध्वनि प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण हेतु उपाय तैयार करना ।
6. विद्युत के दुरुपयोग के प्रति पूर्णतः प्रतिबंध लगाना व निगरानी व्यवस्था दुरुस्त करना ।
7. सौर ऊर्जा का प्रत्येक परिवार तक सुलभ पहुँच बनाने पर कार्य करना।
8. विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर छात्रों द्वारा प्राकृतिक जागरूकता कार्यक्रम चलाना व स्वयं जागरूक होना ।
9. शोधकर्ताओं द्वारा प्राकृतिक संतुलन संबंधी शोध को बढावा देना।
10, संत महात्माओं द्वारा अपने प्रवचनों में प्रकृति के प्रति जागरूकता के लिए व वृक्षारोपण के लिए अपील करना व स्वयं मिलकर वृक्षारोपण व प्रकृति संबंधी कार्य कराना।
11. प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पहले से ही प्राकृतिक जागरूकता के कार्यक्रम प्रसारित कर  ही रहे हैं, इसे जमीनी तौर पर कार्यरूप देना।
12. शासन, प्रशासन और न्यायालय  ऐसे वस्तुओं के तमाम उपयोग पर रोक लगाए जिनसे प्रकृति का शोषण हो रहा है।
13. जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा के प्रति लोग गंभीर बनें।
14. फिल्मों व टीवी कार्यक्रमों में प्राकृतिक जागरूकता के कार्यक्रम तैयार करके लोगों को प्रेरित करना।
        इस तरह प्राकृतिक जागरूकता को  प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाना होगा और प्रकृति को अपने प्रिय मित्र या प्रिय नातेदारों में शामिल करना होगा । तात्पर्य यह कि किसी भी तरह से हर व्यक्ति प्रकृति के महत्व को समझ जाएँ।

प्राकृतिक क्रांति के अग्रदूत :-
        इस कार्यक्रम के लिए विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को मिलकर एक मॉडल के तहत काम करना होगा । लोग अपने-अपने समूह में या स्वतंत्र रूप से भी पर्यावरण संबंधी काम कर सकते हैं। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका सभी देशों की सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की है, प्रत्येक देश के प्रत्येक व्यक्ति की है। इसमें छात्र, महिला, मजदूर, किसान, युवा, व्यापारियों की भागीदारी अनिवार्य है । सरकार और जनता को मिलकर प्रकृति के प्रति प्रतिबद्ध होना होगा। सुबह की हवा को लाख रूपए की दवा कहा जाता है,  इस अत्यंत महंगी दवा को, जो आज मुफ्त में उपलब्ध है, इसको भविष्य के लिए सुरक्षित रखना होगा। सभी लोगों के ध्यान में रहे कि प्रकृति हमारे परिवार का एक प्यारा सदस्य है और उसकी सुरक्षा हम सब का कर्तव्य है।

प्राकृतिक क्रांति : एक उदाहरण :-
        डिस्पोजल के दुष्प्रभाव के प्रति जागरूकता के लिए हमारे लगभग बीस भाई-बहनों के द्वारा एकसाथ मिलकर निःशुल्क चाय वितरण का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है । इस कार्यक्रम के तहत पिछले पांच वर्षों से संत समागम मेला में चार दिन तक लगभग 40 हजार लोगों को नि:शुल्क चाय का वितरण स्टील के कप में किया जाता है । इसके साथ-साथ डिस्पोजल व प्लास्टिक से होने वाले दुष्प्रभाव के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है । इसकी जागरूकता के लिए पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित की जाती है । और लोग आपस में कप में चाय पीते हुए प्लास्टिक व डिस्पोजल के दुष्प्रभाव के प्रति समूह चर्चा भी करते हैं ।
इस कार्यक्रम का प्रभाव इतना अवश्य हुआ है कि इस क्षेत्र में लोगों के हाथों में  अचानक  डिस्पोजल आ जाने पर दिमाग में यह बात अवश्य आती है कि यह उचित नहीं है । यह स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक है । लोग अवश्य जागरूक हो रहे हैं अपने बच्चों को बिल्कुल मना करते हैं कि डिस्पोजल या प्लास्टिक का उपयोग मत करो। इस कार्यक्रम को प्रारंभ करने वाले मेरे साथियों में श्री चित्रेन्द वर्मा , श्री विक्रांत वर्मा , श्री कौशल वर्मा , श्री अशोक वर्मा , श्री ललित वर्मा , श्री गैंदराम वर्मा , श्री प्रहलाद सिंह वर्मा , श्री सतीश वर्मा , अधिवक्ता, श्रीमती गौरी वर्मा  और इस क्षेत्र के लगभग पचास युवा हैं जिन के सहयोग से यह जागरूकता कार्यक्रम सफल होता है । इस तरह के जागरूकता उत्पन्न करने संबंधी कार्य पूरे विश्व में होना आवश्यक है। ऐसे प्रयासों से प्राकृतिक क्रांति को सफल बनाना होगा ।

आलेख लेखक *- उमराव सिंह
बेमेतरा, छत्तीसगढ़, भारत

umraosinghverma.blogspot.com
पर स्वप्रकाशित
 05 जून 2020 _विश्व पर्यावरण दिवस_

सोमवार, 1 जून 2020

चिरकुटी देव

चिरकुटी देव



गांव सेमरिया के चारों तरफ के सीमा पर एक देव स्थल है जहाँ पर चिरकुटी देव स्थापित है मान्यता है कि ग्राम के सीमा पर इस देव स्थल के होने से बाहर से कोई भी बिमारी या महामारी गांव में प्रवेश नहीं करता । यह गांव के पशु पक्षी, फसलों व मनुष्यों की तमाम तरह के बीमारियों से रक्षा करती है । दुसरे गांवों के बुजुर्ग भी बतातें हैं कि लगभग सभी गांवों के सीमाओं में गांव के रक्षा हेतु देवस्थल होते हैं परंतु वर्तमान में धीरे धीरे ऐसी मान्यताएं विलुप्त होती जा रही हैं। इस देवस्थल से गुजरने वाले जानकार राहगीर इस पर पत्थर चढाकर चरण स्पर्श करते हैं। 

लेखक - उमराव सिंह
सांस्कृतिक मानववैज्ञानिक




मंगलवार, 26 मई 2020

In front of Nature

My first poem for all the people of the world



 Title - "In front of nature"

 We are human beings,
 Where are humans?
 We
 Some are Indians, some are American,
 Some European, some Asian
 Any caste, any tribe
 We are human beings,
 Where are you?

 We are human beings,
 In front of nature,
 In front of that truth,
 There are no Indians, no Americans,
 Neither European nor Asian
 Neither african
 There is no caste, no tribe
 We are human beings,
 In front of nature.

 Our breath is from trees,
 Our life is, by nature,
 We are children, of nature,
 Our parent is nature,
 We are human beings,
 In front of nature.

 Our duty is
 We understand its importance,
 We decorate its beauty,
 Let us cooperate together,
 Vow to keep it clean forever,
 We are human beings,
 In front of nature.

 The whole world of nature,
 Pend plant fauna,
 Residents of the sky,
 All are creation of nature,
 We all have a partner,
 With each other,
 No developed
 Neither are there any development,
 Because,
 We are only human beings, in front of nature.

 - umrao Singh
    Blog -
 umraosinghverma.blogspot.com
 (This poem is the first page of my books ready for publication)

प्रकृति के सामने





शीर्षक - "प्रकृति के सामने"

हम मनुष्य हैं,
कहाँ पर मनुष्य हैं ?
हम तो
कोई भारतीय हैं, कोई अमेरिकन हैं,
कोई युरोपी, कोई एशियन
कोई जाति है, कोई जनजाति
हम मनुष्य हैं,
कहाँ पर हैं ?

हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने,
उस सत्य के सामने,
न कोई भारतीय हैं, न कोई अमेरिकन,
न कोई युरोपी, न कोई एशियन
न अफ्रिकन
न कोई जाति है, न कोई जनजाति
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने ।

हमारी सांसे हैं, पेडों से,
हमारा जीवन है, प्रकृति से,
हम संतान हैं, प्रकृति के,
हमारा पालक, प्रकृति है,
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने ।

कर्तव्य है हमारा,
हम समझें इसकी महत्ता को,
हम संवारें इसकी सुंदरता को,
हम मिलकर इसका सहयोग करें,
इसे सदा स्वच्छ रखने का प्रण करें,
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने।

प्रकृति का सारा संसार है,
पेंड पौधे जीव जन्तु,
जल थल आकाश के वासी,
सब प्रकृति के निर्माण हैं,
हम सब एक साथी है,
एक दुसरे का साथ,
कोई विकसित नहीं,
न कोई विकासशील हैं,
क्योंकि,
हम केवल मनुष्य हैं, प्रकृति के सामने।

- उमराव सिंह
   Blog -
umraosinghverma.blogspot.com

शुक्रवार, 15 मई 2020

ओले हैं या जवाब अत्याचार का

*ओले हैं, या जवाब अत्याचार का...*           
                 - _उमराव सिंह_

तेज धुप था, बस थोडी ही देर में तेज बारिश और वो भी खुब बर्फ मतलब ओले और तुफान के साथ...
हम बाजार के एक कोने पर रूक गए.. बारिश, तूफान और बरफ के भयानकता को देखकर ध्यान उस इंसान की ओर जा रहा था जो उस समय बाहर खेत खलिहान में रहा होगा और आसपास छुपने का कोई ठिकाना नहीं रहा होगा, उस पर क्या बीती होगी...
इस बात को अधिकतर लोग जानते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है हर बच्चे के स्कूल कॉलेज के कोर्स में पढाया जा रहा है...
फिर भी डिस्पोजल, पॉलीथिन आदि का उपयोग कम ही नहीं हो रहा है वृक्षारोपण पर गंभीरता बिल्कुल नहीं है  पेट्रोल और डीजल का उपयोग ऐसा बढा कि गांव तरफ लोग तालाब भी बाइक में जाते हैं कार्बन डाइऑक्साइड, या फ्रिज एसी से निकलने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन के स्तर को कम करने का वचन लेने का कर्तव्य, डिस्पोजल या पॉलिथीन का उपयोग बंद करने कर्तव्य केवल सरकार का नहीं, हम तमाम लोगों का है फ्रिज और ए.सी.(एयरकंडीशनर) के बिना लोग रह नहीं पा रहे हैं आधा घण्टा लाइट चली जाए तो बिजली आफिस में सैकड़ों फोन चली जाती है, आज हम अत्यंत सुविधाभोगी हो चुके हैं मिट्टी के फर्स पर टाइल्स बिछा रहे हैं ये सब केवल अपनी सुविधा के लिए ताकि झाडु कम लगाना पडे, टाइल्स लगाओ, बर्तन कम धोना पडे डिस्पोजल लाओ.. जरा अंदाज़ा लगा सकते हैं कि केवल हमारे देश की जनसंख्या सवा अरब है इसमें से केवल पचास प्रतिशत लोग ही दिन में केवल एक पॉलिथीन या डिस्पोजल उपयोग करते होंगे तो केवल एक दिन में कितना प्लास्टिक जमीन पर बिछाया जा रहा है...
इस तरह की सुविधाओं ने प्रकृति को चैन की सांस लेने के लायक नहीं छोडा है और जनजीवन के लिए खतरा बनता जा रहा है और जितनी तेजी से वातावरण पिछले कुछ ही वर्षों में परिवर्तित हुई है विकराल रूप ले रहा है शायद ही सैकड़ों साल पहले ऐसा हुआ होगा...

प्रकृति आज बरफ और तुफान के रूप में चीख चीख कर कह रही है कि अभी भी वक्त है, सुधर जाओ, फेंक दो उन तमाम चीजों को जो प्रकृति का विनाश कर रही है... बडे नहीं तो कम से कम पढने लिखने वाले बच्चे समझें...  कम दुरी में जाना हो तो गर्व के साथ सायकल ही चलाइए, सायकल चलाने में शर्म मत कीजिए कि हम ये हैं, वो हैं, फलाना हैं, ढिकाना हैं तो सायकल कैसे चलाएंगे.. ऐसा मत सोचें बल्कि सुरक्षित भविष्य के लिए ये करना ही होगा, हम जाने अन्जाने वास्तव में अत्याचार ही कर रहे हैं प्रकृति के साथ...
आज हम सभी को प्रकृति के प्रति गंभीर होने की अत्यंत आवश्यकता है और ये हम सभी का कर्तव्य है तभी कल, हम और हमारे आने वाली पीढी सुकून की सांस ले पाएगी...

- उमराव सिंह,
umraosinghverma.blogspot.com

सोमवार, 11 मई 2020

पढाई कैसे करें...

*पढाई कैसे करें...*
                - _उमराव सिंह_

पढाई करने का तरीका, यहाँ दो चीजें ध्यान देने वाली है कि हमें अपने कक्षा का कोर्स को किस तरह पढना चाहिए जिससे हमें चेप्टर का कोई टॉपिक अच्छे से याद रहे, या समझ में आ जाए क्योंकि किसी कॉन्सेप्ट को समझ जाने के बाद याद करने या रटने की जरूरत नहीं पडती, और दुसरी चीज की हमें अपना पढाई को कैरियर बनाने के लिए किस तरह से आगे बढना चाहिए।
एक उदाहरण से बात शुरू करते हैं मेरा एक दोस्त है वो दसवीं के बाद ग्यारहवीं में बायो लिया था अब क्या मन हुआ तो बारहवीं के बाद आईटीआई कर लिया कोपा में, अब आईटीआई के बाद बीएससी में एडमिशन लिया, बीएससी के साथ साथ टाइपिंग क्लास जाता था अब बीएससी के बाद पीजीडीसीए और अभी राजनीति में प्राइवेट एम.ए किया पर किसी में फस्ट डीवीजन नहीं ला पाया, क्योंकि वही, सॉटकट की पढाई...
परीक्षा के दो चार दिन पहले पतली पतली गाइड खरीद लेता था और उसमें आईएमपी समझ के केवल पांच छह प्रश्न पढ लेता था तो ऐसा पढने से यदि अच्छा प्रतिशत आ भी जाए तो विषय का नॉलेज या विषय में पकड नहीं रहता।
अब ऐसा पढने से उसे स्वयं समझ में नहीं आ पाता कि वो  किस फिल्ड में कैरियर बनाना  चाहते हैं।
हां, कुछ दिन वो पीएससी का कोचिंग भी किया... पर कुछ नहीं मिला...

तो ऐसा पढाई केवल पैसा खर्च करना है इससे साफ पता चलता है कि आपने अपना एक लक्ष्य नहीं बनाया है और हां, आजकल के कॉम्पीटिशन के दौर में लक्ष्य बनाना मुश्किल होता है कि हर विषय के पढे लिखे लोगों को आसपास बेरोजगार देख रहे होते हैं, इसलिए पढाई में गंभीर नहीं रहते,
तो ये आइडिया गलत है...
आप कभी भी पढाई कीजिए केवल एक दिशा में पढाई करे़ मलतब जिस विषय में आपका वास्तव में रूचि है बारहवीं या दसवीं के बाद उसी को चयन कीजिए और उसी विषय में जितना आगे तक पढाई होती है पढने की कोशिश कर सकते है जैसे यदि दसवीं के बाद इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र या पत्रकारिता जो भी लिए हैं तो आगे इसी में स्नातक मतलब बी.ए. किए, फिर इसमें से जिसमें रूचि है उसी में एम.ए., एम.फिल., पीएचडी, और रिसर्च लेवल तक, जहाँ तक आप पहुंच पाएं, एक लाइन में पढाई करना चाहिए। और पढाई को जीवन में  कभी भी पतली पतली गाइड से मत कीजिए, हमेशा अपने विषय की किताबें पढिए उन मोटी मोटी किताबों को ऐसे ही सो पीस के लिए नहीं छापा गया है, इससे आपको उस विषय का रियल नॉलेज और विषय में पकड रहेगी तो भविष्य में उस विषय का विषय विशेषज्ञ बन सकते हैं जैसे यदि आप बारहवीं बायोलॉजी के बाद भूगर्भ शास्त्र या फोरेंसिक साइन्स ले लिए तो उसी में आगे बढिए, यदि कम्प्यूटर में रूचि है तो केवल उसी में, संगीत, पेंटिंग, डिजाइनिंग कुछ भी करें केवल एक रास्ते में बढे... और जिस विषय में आगे बढना है उसी में गहन अध्ययन करें...

अब दुसरी बात में आतें हैं कि कैसे पढना चाहिए, अपने पढाई करने वाले कमरे में एक कागज पर लिखकर चिपका दीजिए
  *1.*पढाई, 2. मनन,  3.लेखन 4. स्व आकलन**

मतलब किसी चेप्टर जो आपको पढना है बिल्कुल फ्री होकर सरसरी तौर एक बार पढ लीजिए फिर किताब बंद कर दीजिए, अब  टहलते हुए या कुछ काम करते हुए, या ध्यानमुद्रा में बैठकर आपने कुछ देर पहले जो पढा है उसी को मनन कीजिए, आपको पहली बार में ध्यान में नहीं आएगा, पर धीरे धीरे दिमाग में कुछ टुटा फूटा सा या बिल्कुल लाइन बाइ लाइन दिमाग में आने लगेगा..
फिर जब पुरा मनन हो जाए, तो उसको बिना देखे लिखने की कोशिश कीजिए, आपसे जैसा टुटा फूटा लिखाए, बस लिखते जाइए...
फिर उसी लिखे हुए को पढे हुए से मिलाइए... इस विधि से पढाई करने से आपका स्कूल, कॉलेज या प्रतियोगिता परीक्षा के टॉपिक्स भी बडी आसानी से तैयार होता है
.... तो एक बार कोशिश जरूर कीजिए...

- उमराव सिंह
umraosinghverma.blogspot.com

सूबह कौआ दिखा

"सुबह कौआ दिखा"
                     - उमराव सिंह

रोज की तरह आज सुबह साढे पांच बजे जब मैं छत पर गया, और कुछ देर ध्यान, आलोम विलोम और भ्रामरी का दौर चल रहा था उठा तो दुसरे छत पर दो कौएं दिखाई दिए, सच मानिए मैं बहुत वर्षों बाद कौंआ देखा, जब 1990- 91 में शुरू शुरू स्कूल जाना शुरू किए थे उस समय गांव के घर में और आसपास बहुत अधिक संख्या में कौआ आते थे बचपन में जब भात का अंगरा रोटी खाते बैठे रहते थे तो कौआ आसपास में कांव कांव अवश्य करते रहता था और हम बच्चे उसे रोटी का टुकरा दे दे कर खुश होते थे... मैने नीचे गया और कुछ चावल और एक बर्तन में पानी लाकर छत में रख दिया,
हमारा बेमेतरा फैक्टरी वाला औद्योगिक क्षेत्र नहीं है वास्तव में अभी इधर चिडिय़ा विलुप्त नहीं हुए हैं परंतु संख्या अवश्य कम हो गया है, बेमेतरा कृषि उद्योग क्षेत्र हैं यहाँ मुख्यतः खेती होती है चना के उत्पादन के लिए ये क्षेत्र प्रसिद्ध है इस तरह खेत खलिहान होने के कारण यहाँ पेड पौधों और हरियाली की मात्रा पर्याप्त है तो चिडियों का चहचहाना भी स्वाभाविक है
मगर औद्योगिक क्षेत्रों में जहाँ बडी बडी कंपनियां बनी, और इनसे निकले हुए धुएं, प्रदुषण, मोटर गाडियों के धुएं, विविध मोबाइल टावर के तरंगे चिडियों के जीवन के लिए खतरा बना हुआ है इस विषय को हाल ही में एक फिल्म में देखाया भी गया हैं
कोयल की आवाज तो सुबह से आ रही है, सुबह के चिर शांत वातावरण में जब कोयल की आवाज गुंजायमान होती है इससे सभी भलिभांति परिचित हैं, आप भी अपने आसपास अनुभव किए होंगे कि कुछ दिनों से चिडियों की चहचहाना फिर से सुनाई देने लगी है एक उम्मीद की पृथ्वी में छाई हुई प्रदुषण का घोर अंधेरा कहीं गायब हो जाए, कुछ दिन पहले पढने को मिला था ओजोन परत में हुआ छिद्र पुनः ओजोन यूक्त हो रहा है कितनी सच्चाई है ये वैज्ञानिक पुष्टि करेंगे, परंतु ये तमाम चीजें आम जनसमुदाय को समझना आवश्यक है कि हम अपने भौतिक सुख सुविधा के लिए कितने खतरनाक चीजों के उपयोग को बढावा दिए हैं बच्चे सदियों से पढते आ रहे है कि फ्रिज, एसी, प्रकृति में सीएफसी गैस प्रवाहित करती है जो ओजोन परत को नुकसान पहुंचाया है और तापमान निरंतर बढा है विकिपीडिया के अनुसार "क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) एक कार्बनिक यौगिक है जो केवल कार्बन, क्लोरीन, हाइड्रोजन और फ्लोरीन परमाणुओं से बनता है। सीएफसी का इस्तेमाल रेफ्रिजरेंट, प्रणोदक (एयरोसोल अनुप्रयोगों में) और विलायक के तौर पर व्यापक रूप से होता है।ओजोन निःशेषण में इसका योगदान देखते हुए, सीएफसी जैसे यौगिकों का निर्माण मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत चरणबद्ध तरीके से बंद कर दिया गया है। सीएफसी के द्वारा ओजोन परत को नुकसान होता हैंं"
इस बात को हर बच्चा बच्चा जानता है वो निबंध लिखा है मगर वो आज वो जानबूझकर एसी के बिना रह नहीं सकता, फ्रिज के बिना रह नहीं सकते,
तो गलती कौन कर रहा है
क्या उत्पादक , नहीं, किसी वस्तु का निर्माण विज्ञान ही करता है लेकिन विज्ञान द्वारा निर्मित उस वस्तु का उपयोग तब संभव होता है जब उसे समाज और जनसमुदाय के द्वारा हरी झंडी मिल जाती है अर्थात लोग ऊसका अत्यधिक उपयोग करने लग जाते हैं और एक व्यापार चल पडता है ...
ओह देर हो रही है आगे कभी और...

धन्यवाद, सप्रेम साहेब बंदगी...

छत्तीसगढ़ की लोककला, कविता और आज

*छत्तीसगढ़ की लोककला, कविता और आज*
- उमराव सिंह

कल ही की बात है मुझे छत्तीसगढ़ी गीत सुनने का मन हुआ और जैसे ही शुरु किया "तै बिलासपुरहीन अऊ मैं रायगढीया" तो पास में एक युवक ने तत्काल ये कहा कि "बंद करो, मुझे छत्तीसगढ़ी गाना पसंद नहीं है भद्दे भद्दे गाना गाते हैं और हमेशा छत्तीसगढ़ को पिछड़ा दिखाते हैं" ये उसका शिकायत था फिर मैने उनको ये गीत पुरा सुनाया फिर और लगभग एक घण्टे तक छत्तीसगढ़ के पुराने गीतों का पिटारा खोला और उन्हें सुनने को कहा
- कांटा खुटी के बिनइया..
- पता ले जा रे गाडीवाला
- मोर संग चलौ रे
- झुल तरी बेलन

और इसी तरह के सोनहा बिहान और चंदैनी गोंदा के समय के प्रसिद्ध और मधुर छत्तीसगढ़ी गीतों को जब वो सुना तो थोडी देर के लिए भावविभोर हो गया...

वास्तव में छत्तीसगढ़ की लोककला और संगीत ने ही छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति को संरक्षित रख पाया है अन्यथा आज के बच्चों में अपनी ही संस्कृति के प्रति सम्मान नहीं है जो या तो अज्ञानवश है या आजकल के भद्दे गीतों और कविताओं को सुनकर उसका मन उब गया है आज ऐसे ऐसे गीत है जिसे परिवार के साथ या अपने से बडों के साथ सुनने में शर्म आ जाए,
लेकिन अधर्म का उम्र लम्बा नहीं होता, जो गीत सम्मानित समाज के बीच पसंद नहीं किया गया वो कहीं न कहीं सिमट कर रह गया

लेकिन जो गीत और संगीत पुरे सम्मान के साथ अपनी संस्कृति को प्रस्तुत किए हैं वो आज भी उसी सम्मान के साथ सुने जाते हैं देखे जाते हैं गुनगुनाएं जाते हैं...
- मंगनी मा मांगे मया नई मिले जी मंगनी म
-झुलतरी गेंदा, इंजन गाडी सेम्हर फुलगे...

वो महान नाम हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ के संस्कृति को एक संस्था के माध्यम से मंच प्रदान किया और छत्तीसगढ़ की मिट्टी की वास्तविक दृश्य के लिए दर्शक तैयार किया, स्व. दाऊ रामचंद्र देखमुख , स्व. दाऊ महासिंह चंद्राकर, दाऊ दुलार सिंह मंदराजी, स्व.केदार यादव, श्री कुलेश्वर ताम्रकार जी, और अनेक नाम हैं जो छत्तीसगढ़ की संस्कृति  को कम से कम अभी के युवापीढ़ी और बच्चों को जानने समझने के लिए मंच के माध्यम से प्रस्तुत कर दिए हैं अन्यथा आज के बुजुर्ग भी बच्चों को कहानी सुनाना छोड दिए हैं या बच्चे ही रूचि नहीं लेते..

इसी तरह आज के नए जमाने के जो गीतकार हैं कवि हैं संगीतकार हैं गायक गायिका हैं उन्से विनम्र निवेदन है कि गीत या कविता ऐसा लिखिए, ऐसा गाइए कि लोग सम्मान पूर्वक अपने परिवार और आसपास के लोगों के साथ देख सके, सुन सके... इसी तरह आज के बहुत से कवियों के कविताओं में धर्मपत्नी के ऊपर बहुत से टिप्पणी भरा कविता लिखी और सुनाई जाती है
ये नारी सशक्तीकरण का सपना संजोए हुए समाज के सामने महिलाओं के प्रति टिप्पणीयों से भरी हुई कविताएं क्या उचित है ?  जिसको मंच पर कविता है कह कर बडी आसानी से बोल दिया जाता है और सुन लिया जाता है और हस के निकल लेते हैं ऐसे ही पति के ऊपर मजाकिया टिप्पणी भरा कविताएं आज बहुत है क्या पती पत्नी का रिश्ता केवल कविताओं में मजाक बनाने के लिए है ?

आपको नहीं आता है तो मत लिखिए, आपको नहीं आता है तो मत गाइए मगर कृपा करके अपनी संस्कृति को बरबाद मत कीजिए,
और भी बहुत से विषय है लिखने के लिए, जो अनेक समस्याओं के प्रति ध्यानाकर्षित करते हों, जो आने वाले पीढी के लिए शिक्षाप्रद हो, ऐसा कविता लिखिए...
स्व.श्री माखनलाल चतुर्वेदी जी केवल एक कविता से फैमस हो गए जबकि वो फैमस होने के लिए नहीं लिखे थे... याद होगी,
पुष्प की अभिलाषा..
मुझे तोड लेना ऐ वनमाली, उस पथ पर देना तुम फेक, जिस पथ पर जाए वीर अनेक...

धन्यवाद

शराब एक सामाजिक विकृति

"Wine is a Social Dysnomia"
"शराब एक सामाजिक विकृति"
                   - उमराव सिंह

प्रस्तावना एवं अर्थ :- आपने एक शब्द "डिसॉर्डर" सुने और पढें हैं विज्ञान में डिसॉर्डर एक शारीरिक विकृति है डिसॉर्डर जैसा ही फिजियोलॉजी में  एक शब्द Dysnomia डिस्नोमिया है जिसमें जब दिमाग ठीक से काम नहीं करता, या किसी चीज को याद रखने की क्षमता कम हो जाती है अर्थात मानसिक विकृति ऐसे ही शराब एक सामाजिक डिस्नोमिया बन चुका है या सामाजिक बुराई कह सकते हैं । जिस तरह शरीर को बिमारियां लगती है वैसे ही समाज को भी बीमारियां लगती है नशा, दहेज, हिंसा, मांसाहार ये सब सामाजिक बिमारियां है जिसे सोशल डिस्नोमिया कह सकते हैं ।

परिभाषा :- मानव समुदाय में व्याप्त वह नकारात्मक तत्व जो समाज की व्यवस्था को विकृत कर देती है और मनुष्य की सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है। और उसकी सत्य को पहचानने की क्षमता एवं चिंतन करने की क्षमता कमजोर पड जाती है या नैतिक शिक्षा की कमी से विकसित ही नहीं हो पाती ।

विवेचना :- कल शराब शुरू हुआ और लम्बी लाइन भी लग गई, दिनभर फेसबुक में शराब के विरोध और शराबबंदी की मांग की हजारों आवाज उठी है लोग सोशल मिडिया में भर भर के शराब का विरोध किए, मगर शराब नहीं रूका, जिसको बेचना है बेच लिया जिसको पीना है पी लिया,
आज का समय कोरोना के कारण खतरनाक है ये बात लगभग सभी जानते हैं जिसके हाथ में मोबाइल है सोशल मीडिया है और जो टीवी के सामने बैठा है वो जानता है कि अभी कोरोना अत्यंत खतरनाक है लेकिन क्या वो आदमी भी उस लाइन में नहीं खडा है जो सबकुछ जानता है ? जब वो जानबूझकर लाइन में खडा है तो जो नहीं जानता वो किसी को क्यों महत्व देंगे...
इसमें बात केवल समझ की है
जो शराब के लिए लाइन में खडा उसको स्वयं के सम्मान की चिंता नहीं है उसको कोई फर्क नहीं पडता कि शराब लेते चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे, इस सम्मान का परवाह रहता तो वह खरीदने ही क्यों जाता,
शराबबंदी करो, हम पुरजोर विरोध करते हैं, ये गलत हो रहा है ऐसी ऐसी बातें केवल फेसबुक में लिख देने से क्या शराब बंद हो जाएगी।
आज कोरोना है इसलिए शराब के विरोध में आवाजें उठी हैं क्या इससे पहले किसी ने विरोध किया ?
मात्र हाथ जोडकर निवेदन करने से सुधार नहीं होता, उसके लिए कर्म करना पडता है
आज हमें ये चिंतन करने की जरूरत है कि शराब लोगों के दिमाग से कैसे निकले,
 दुध देने वाली गाय को कोई जंगल में छोड कर नहीं आता, शराब दुध दे रही है जिस दिन दुध देना बंद कर देगा उस दिन शराब स्वतः खतम हो जाएगा मतलब जिस दिन लोग शराब खरीदना बंद कर देंगे उस दिन स्वतः शराब का हौसला टुट जाएगा
 शराब के लिए जो लम्बी लाइन लगी हुई है उसका कारण शिक्षा की कमी है उसका कारण उसमे समझ की कमी है उसका कारण अपने सम्मान की चिंता की कमी है
केवल नाम गांव लिखने आ जाने से आदमी समझदार नहीं हो जाता, केवल साक्षरता को बढाने से समझदारी नहीं आएगी, लोगों में वास्तविक नैतिक शिक्षा का होना आवश्यक है
केवल नैतिक शिक्षा ही ऐसा हथियार है जिससे मानव समाज शराब को स्वतः छोड देगा फिर किसी आंदोलन की जरूरत नहीं पडेगी,
आज शराब इसलिए बिका है क्योंकि लाखों लोग इस खतरनाक समय में भी लाइन में लगकर शराब खरीदना पीना को गलत नहीं समझे हैं मतलब उसके दिमाग में इतनी समझ नहीं है कि हम शराब ना खरीदे,
तो ये सोचिए कि ऐसा स्थिति कैसे पैदा हो कि एक आदमी का हृदय शराब खरीदने की गवाही ना दे... और जो पीढी आज शराब की लाइन में खडी है वो अपने सम्मान के प्रति जागरूक कैसे हो,
शराब एक सामाजिक बुराई है क्योंकि ये लोगों की बहुत बडी संख्या के बीच अपना स्थान बना चुका है लोग जो अत्यंत शिक्षित हैं वो भी शराब पी रहे हैं जो नहीं पढे लिखें हैं वो भी पी रहे हैं तो यह एक व्यापक रूप से फैला हुआ सामाजिक बीमारी है और इसको बंद करने की मांग करना मतलब सामाजिक परिवर्तन की मांग करना है और कोई भी सामाजिक परिवर्तन एकाएक तत्काल नहीं होता उसके लिए जागरूक होना पडता है
अब ये सोचिए कि आज शराब के लाइन में खडे हुए लोगों में यह जागरूकता कैसे ला सकते हैं
इसमें जितना दोषी शराब बेचने वाला है उससे बडा अपराधी है शराब खरीदने वाला,
 वास्तविक दोषी वही है जो लाइन में खडा है शराब के लिए..
एक समय समाज में सती प्रथा एक बहुत बडी सामाजिक बुराई था जरा सोचिए राजा राम मोहन राय को उस समय सती प्रथा को बंद करने के लिए उस समय की परिस्थिति में कैसी परिस्थिति का सामना करना पडा होगा, उस समय के कुंठित मानसिकता ने क्या राजा राममोहन राय का विरोध नहीं किया होगा ? बिल्कुल किया होगा, और समय के साथ सती प्रथा का अंत हुआ, ऐसे ही शराब का भी अंत होगा, निश्चित रूप से होगा... बस इसे खतम करने का सही तरीका अपनाना होगा। हां, परंतु अभी वर्तमान की स्थिति में सरकार द्वारा ही मधुशालाओं को  बंद रखने का शख्त हिदायत होना चाहिए।

उपाय जिससे दुरगामी सुधार होगा
1. सामाजिकरण
2. नैतिक शिक्षा : मशीनी शिक्षा ने आज युवाओं अपने समाज, धर्म के महत्व को नगण्य बना दिया है हर सुविधा के लिए बडा बडा मशीन बनाने की होड में लोग समाज, नातेदारी का महत्व को भूलते जा रहे हैं विवाह, परिवार एक सामाजिक व्यवस्था का प्रकार्यात्मक अंग है परंतु आज परिवार विवाह केवल औपचारिकता बनता जा रहा है इसका कारण है नैतिक शिक्षा की नितांत कमी, और केवल साक्षरता दर बढाने का उद्देश्य
3. रोजगार की सही परिभाषा विकसित होना क्योंकि आज लोग पढाई करने का अर्थ केवल नौकरी पाना समझते हैं और वास्तव में आज केवल नौकरी पाने के लिए लोग पढाई कर रहे हैं पढाई करके खेत में काम करना सब अपने स्टेटस के लिए खराब समझते हैं जबकि ऐसा नहीं है शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य केवल उचित और अनुचित को समझना है । मात्र नौकरी पाना नहीं ।

(किसी गलती पर सुझाव अवश्य देवें, यह मेरा मौलिक लेख है)

- उमराव सिंह

सेमीनार से वेबीनार की ओर

सेमिनार से वेबिनार की ओर : उत्तर आधुनिक काल
                      - उमराव सिंह
गहन रूप से उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे लोग ही सेमिनार को जानते थे विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में किसी विषय पर राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार होते रहता है जिसमें अनुसंधान करने वाले छात्र अपने शोधपत्र प्रस्तुत करते हैं कुछ समय से कुछ राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय बिजनेस कंपनियां अपने उत्पादन के प्रचार या लोगों को अपने बिजनेस से जोडने के लिए सेमिनार के आयोजन का दौर चला, न्यूज पेपर के पाठक व पठन पाठन में रूचि रखने वाले कुछ आमजन सेमिनार शब्द से परिचित रहे हैं और अंदर चलें तो ग्रामीण समुदाय जनसमुदाय और शहरों के भी बहुत बडी जनसंख्या इस शब्द से बिल्कुल अनभिज्ञ रहा है सेमिनार शब्द की बात करो तो कुछ लोग वो सब्जी वाली सेमी का नार कहकर मजाक भी उडा देते हैं
अब उत्तर आधुनिक संचार क्रांति ने एक नया शब्द से परिचित कराया है वेबिनार।
वेबिनार हाल ही में कुछ हफ्तों महिनों से उपयोग में आने वाला एक शब्द है जिसमें वेब या कम्प्यूटर के द्वारा आनलाईन बातें होती है जिसको वीडियो कॉन्फ्रेंस भी कहते हैं यदि किसी विषय पर विडिओ कॉन्फ्रेंस के द्वारा बातें हुई तो वह इलेक्ट्रॉनिक मिडिया में संपूर्ण जनसंख्या के सुनने के लिए सुरक्षित भी कर लिया जाता है तो जहाँ सेमिनार में अधिकतम चार पांच सौ लोग वक्ताओं को सामने से सुन पाते थे आज पुरी दुनिया सुन रहा है देख रहा है इंटरनेट के माध्यम से..
वैश्वीकरण की उपज इस शब्द से आम जनसमुदाय कब परिचित होगा, खेतिहर मजदूर इससे कब परिचित होगा  जब वो वेबिनार के पूर्वज सेमिनार से ही परिचित नहीं है... उत्तर आधुनिक काल वह है जब से संचार क्रांति हुई, और इससे पहले का समय जब औद्योगिकरण हुआ वह आधुनिक काल था  तो एक ही समय जहाँ एक वर्ग उत्तर आधुनिक युग में जी रहा है उस समय पर बहुत बडी जनसंख्या अभी तक आधुनिक काल में ही है
इससे आगे और चले तो आज भी एक बहुत बडी जनसंख्या आदिम युग में जी रहा है आप जानते हैं जिसको सरकार ने विशेष पिछडी जनजाति का दर्जा दिया है ये आज वेबिनार के समय में आदिम युग में जी रहे हैं छत्तीसगढ़ में भी ऐसे पांच जनजातीयां चिन्हांकित हैंं पहाडी कोरवा, बैगा, कमार, अबुझमाडिया और बिरहोर, ये तो रही बात हमारे छत्तीसगढ़ की..
अफ्रीका में आदिम जनजातियां, अंडमान निकोबार की ओंगे, सैंटेननिलिस, जारवा
ये वो जनजातियां हैं जो आज भी शिक्षा से परिचित नहीं है तो सेमिनार और वेबिनार से परिचित कब होगा....

- उमराव सिंह

शनिवार, 9 मई 2020

जेठ की ठंडी हवाएँ

जेठ की ठंडी हवाएं...
-उमराव सिंह

हल्की बारीश हो गई और बारिश के बाद की गुलाबी हवाओं की सुगंध से आप वाकिब हैं लेकिन सोचने वाली बात ये है कि ये ज्येष्ठ का महिना है वो जेठ जिसमें चिलमिलाती धुप पडती थी जेठ के महिने में ऐसी ठंडी हवाओं की कल्पना प्रेमचंद की पुस की रात से ठीक विपरीत है क्योंकि पूस की रात की कडकडाती ठंड और जेठ की चिलमिलाती धुप से सब परिचित हैं मगर कल शाम को बल्ब और ट्यब लाइट के नीचे अत्यधिक संख्या में कुछ किडे पतंगें उड रहे थे जिसे हमारे बेमेतरा क्षेत्र में बत्तर किरा कहते हैं बुजुर्ग किसान जो जीवन भर जमीन पर अन्न उगाते आए हैं वो इन पतंगों को बरसात का संकेत मानते हैं इन पतंगों को बरसात का संकेत माना जाता है और ये पतंगें उस स्थिति में दिखाई पडते हैं जब किसान अपनी खेती की शुरुआत कर रहे होते हैं मुझे अच्छे से याद है पहले स्कूल जुलाई में खुलता था यह जुलाई बरसात का मौसम होता था और हम बच्चे आंगन में बैठे पढाई करते थे तो ये पतंगे आसपास उडने के बाद उनके खुब सारे पंख टुट कर गिरे रहते थे  ये किडे न जाने क्यों केवल बरसात में ही दिखाई पडता था वो भी केवल दो चार दिन... फिर कहीं गायब...
इस बात को लिखने का कारण ये है कि मई जून यानि हिन्दी का बैशाख ज्येष्ठ का महिना, भयानक गर्मी, तापमान 26-47℃ तक पहुंच रहा था रोड में गन्ना रस, बर्फ गोला, आइसक्रीम और कोल्डड्रिंक की कतारें होनी पडती थी
अब जरा सोचे जेठ के महिने में आज ठंडी हवाएं, कुछ देर बारिश के बाद फिर से धुप, बत्तर किडा, और सुबह तो फाफा भी दिखा...  ये सब संकेत है जलवायु परिवर्तन का.. जो अब स्थाई होता जाएगा, अब आने वाले जलवायु के अनुसार फसल चक्र भी परिवर्तित होना होगा,  मौसमी गीतों में वो पहले जैसा अनुभव नहीं होगा बल्कि सावन में गर्मी का अनुभव होगा, बरसात और ठंड का मौसम आगे के महिनो में खिसकने लग रहा है...
मौसम और जलवायु में अंतर तो सब पढे ही हैं मौसम वो है जो तेजी से परिवर्तित होता है जैसे एक ही दिन में सुबह धुप और शाम को बारिश। और जलवायु लगभग 30 साल में परिवर्तित होती है इसीलिए आज से तीस साल पहले जिस तरह का बरसात, ठंड और गर्मी का महिना हुआ करता था वो अब काफी परिवर्तित हो चुका है पिछले तीस साल पहले जैसा जलवायु अभी नहीं है... जैसे झडी, आज के बच्चे तो झडी क्या है इसको नहीं जानते झडी उसे कहते थे जब एक हफ्ते पंद्रह दिन तक लगातार पानी गिरते रहता था हफ्तों हफ्तों सुर्य दिखाई नहीं देता था । पहले जैसा जलवायु का कुछ अंश भी अभी चाहिए तो उसके लिए बहुत बडे पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा, पलायन छोडकर खेती की ओर बढना ही होगा, यदि ठान लें इतनी बडी आबादी के लिए बडी बात नहीं है एक आदमी अपने नाम से एक पेड लगाए तो भी सवा अरब पेड होता है... जलवायु परिवर्तन...

- उमराव सिंह