अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस विशेष
परिवार : वर्तमान परिदृश्य
_- उमराव सिंह वर्मा_
_______________________________
आज अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस पर अवश्य ही सोशल मीडिया में खुब पोस्ट किए जाएंगे, परिवार दिवस की बधाई, हैप्पी फैमिली डे आदि। कविता, कहानी, परिवार संबंधी स्लोगन आदि। अच्छी बात है, मगर आज के दौर में परिवारों की हालात देखकर खुशी नहीं मिलती, शादी के कुछ ही दिनों के बाद लोग विवाह विच्छेद मतलब तलाक या भरण-पोषण के लिए न्यायालय पहुंच रहे हैं। बहुत से परिवार टुटते जा रहे हैं पति पत्नी आपस में सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं कल ही के अखबार में पढ़ने को मिला कि एक पति ने सिर्फ सब्जी में नमक कम हो जाने के कारण अपनी पत्नी को जान से मार दिया। आखिर अचानक से ये गुस्सा आ कहां से रहा है आज लोगों में भावनाएं क्यों खतम हो रही है सब्जी में नमक कम हो जाना किसी के जीवन से मूल्यवान तो नहीं है दो दिन पहले पढ़ने को मिला कि मोबाइल में इंटरनेट खतम कर देने के कारण एक बड़े भाई ने छोटे भाई की चाकु से हत्या कर दिया। आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है ऐसे में समाज की नींव कही जाने वाली परिवार नामक संस्था का महत्व तो निरंतर खतम होती जा रही है लोग परिवार और परिवार के लोगों को महत्व ही नहीं दे रहे हैं परिवार के लोगों के पास सभी एक साथ बैठकर हंसने खिलखिलाने का समय नहीं है आपस में कुछ बातें करने का समय नहीं है घर परिवार के लोगों को कम महत्त्व दे रहे हैं कम समय दे रहे हैं और बाहर के लोगों को अधिक महत्व दे रहे हैं अधिक समय दे रहे हैं इसलिए परिवार कमजोर हो रहा है इसे आप किस दृष्टि से आधुनिकता कहते हैं। नया परिवार का निर्माण तो एक पति-पत्नी से होता है फिर क्यों आज पति-पत्नी में एक-दूसरे के प्रति विश्वास खतम होता जा रहा है ? ऐसे में परिवार मजबुती से स्थापित कहां हो पा रहा है परिवार की नींव तो कमजोर होती जा रही है। अब छोटा परिवार सुखी नहीं है बल्कि बच्चे बड़े बुजुर्गो से दूर हो रहे हैं इसलिए बच्चों में आचरण व नैतिक मूल्यों की कमी हो रही है कामकाजी माता-पिता स्वयं बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं छोटे-छोटे बच्चों को शांत रखने के बहाने हाथ में मोबाइल दे दिया जाता है। और बच्चे धीरे धीरे मोबाइल के आदि हो रहे हैं दिनभर आंखों को मोबाइल में गड़ाए हुए हैं हर परिवार के प्रत्येक सदस्यों को इस पर चिंतन करनी चाहिए। ये आज आम बात हो गई है लगभग हर दिन ऐसे समाचार सुनने और पढ़ने को मिल रहा है जिसके बिमारियों, सड़क हादसों और हत्या के द्वारा लोगों की मौत अधिक हो रही है प्राकृतिक मौत की तुलना में आज दुर्घटनाओं में मौत अधिक हो रहे हैं। हम देश को विकसित भारत की ओर देख रहे हैं वो धरती सुखी नहीं है जहां लोग अपना भरपूर जीवन नहीं जी पा रहे हैं या तो भोजन में रसायन के द्वारा, या किसी लड़ाई झगडे के द्वारा या सड़क हादसों के द्वारा लोगों को समय से पहले ही दुनिया से जाना पड़ रहा है। विकसित भारत की तस्वीर निकालने से पहले इन तमाम मुद्दों पर चिंतन करनी चाहिए, सुधार करनी चाहिए, केवल पैसे कमाने और अपनी बड़ी बड़ी बिल्डिंग बनाने के लिए सरकारी नौकरी में नहीं आए हैं बड़े बड़े पद पर नहीं पहुंचे हैं बड़े बड़े नेता, मंत्री, समाज सुधारक आदि बने हुए हैं यदि विकसित भारत की कल्पना करनी है तो भारत के हर नागरिक को अपना नैतिक कर्तव्य समझते हुए इन परिस्थितियों के सुधार की ओर कदम बढ़ानी होगी। यदि आपके भी परिवार में आपके अपनों के बीच कुछ दुरियां आ रही है तो समय रहते उस दुरी को खतम कर लीजिए, साथ बैठकर हंसिए, मजाक कीजिए, बातें कीजिए, खिलखिलाइए... और कृपा करके परिवार बचाइए, समाज बचाइए, आचरण बचाइए...
तब विश्व का कल्याण होगा और विश्व में शांति होगी ।
______________________________
#अंतरराष्ट्रीय_परिवार_दिवस
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें