बुधवार, 15 मई 2024

परिवार : वर्तमान परिदृश्य

अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस विशेष
         परिवार : वर्तमान परिदृश्य
            _- उमराव सिंह वर्मा_ 
_______________________________

आज अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस पर अवश्य ही सोशल मीडिया में खुब पोस्ट किए जाएंगे, परिवार दिवस की बधाई, हैप्पी फैमिली डे आदि। कविता, कहानी, परिवार संबंधी स्लोगन आदि। अच्छी बात है, मगर आज के दौर में परिवारों की हालात देखकर खुशी नहीं मिलती, शादी के कुछ ही दिनों के बाद लोग विवाह विच्छेद मतलब तलाक या भरण-पोषण के लिए न्यायालय पहुंच रहे हैं। बहुत से परिवार टुटते जा रहे हैं पति पत्नी आपस में सामंजस्य नहीं बैठा पा रहे हैं कल ही के अखबार में पढ़ने को मिला कि एक पति ने सिर्फ सब्जी में नमक कम हो जाने के कारण अपनी पत्नी को जान से मार दिया। आखिर अचानक से ये गुस्सा आ कहां से रहा है आज लोगों में भावनाएं क्यों खतम हो रही है सब्जी में नमक कम हो जाना किसी के जीवन से मूल्यवान तो नहीं है दो दिन पहले पढ़ने को मिला कि मोबाइल में इंटरनेट खतम कर देने के कारण एक बड़े भाई ने छोटे भाई की चाकु से हत्या कर दिया। आखिर समाज किस दिशा में जा रहा है ऐसे में समाज की नींव कही जाने वाली परिवार नामक संस्था का महत्व तो निरंतर खतम होती जा रही है लोग परिवार और परिवार के लोगों को महत्व ही नहीं दे रहे हैं परिवार के लोगों के पास सभी एक साथ बैठकर हंसने खिलखिलाने का समय नहीं है आपस में कुछ बातें करने का समय नहीं है घर परिवार के लोगों को कम महत्त्व दे रहे हैं कम समय दे रहे हैं और बाहर के लोगों को अधिक महत्व दे रहे हैं अधिक समय दे रहे हैं इसलिए परिवार कमजोर हो रहा है इसे आप किस दृष्टि से आधुनिकता कहते हैं। नया परिवार का निर्माण तो एक पति-पत्नी से होता है फिर क्यों आज पति-पत्नी में एक-दूसरे के प्रति विश्वास खतम होता जा रहा है ? ऐसे में परिवार मजबुती से स्थापित कहां हो पा रहा है परिवार की नींव तो कमजोर होती जा रही है। अब छोटा परिवार सुखी नहीं है बल्कि बच्चे बड़े बुजुर्गो से दूर हो रहे हैं इसलिए बच्चों में आचरण व नैतिक मूल्यों की कमी हो रही है कामकाजी माता-पिता स्वयं बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं छोटे-छोटे बच्चों को शांत रखने के बहाने हाथ में मोबाइल दे दिया जाता है। और बच्चे धीरे धीरे मोबाइल के आदि हो रहे हैं दिनभर आंखों को मोबाइल में गड़ाए हुए हैं हर परिवार के प्रत्येक सदस्यों को इस पर चिंतन करनी चाहिए। ये आज आम बात हो गई है लगभग हर दिन ऐसे समाचार सुनने और पढ़ने को मिल रहा है जिसके बिमारियों, सड़क हादसों और हत्या के द्वारा लोगों की मौत अधिक हो रही है प्राकृतिक मौत की तुलना में आज दुर्घटनाओं में मौत अधिक हो रहे हैं। हम देश को विकसित भारत की ओर देख रहे हैं वो धरती सुखी नहीं है जहां लोग अपना भरपूर जीवन नहीं जी पा रहे हैं या तो भोजन में रसायन के द्वारा, या किसी लड़ाई झगडे के द्वारा या सड़क हादसों के द्वारा लोगों को समय से पहले ही दुनिया से जाना पड़ रहा है। विकसित भारत की तस्वीर निकालने से पहले इन तमाम मुद्दों पर चिंतन करनी चाहिए, सुधार करनी चाहिए, केवल पैसे कमाने और अपनी बड़ी बड़ी बिल्डिंग बनाने के लिए सरकारी नौकरी में नहीं आए हैं बड़े बड़े पद पर नहीं पहुंचे हैं बड़े बड़े नेता, मंत्री, समाज सुधारक आदि बने हुए हैं यदि विकसित भारत की कल्पना करनी है तो भारत के हर नागरिक को अपना नैतिक कर्तव्य समझते हुए इन परिस्थितियों के सुधार की ओर कदम बढ़ानी होगी। यदि आपके भी परिवार में आपके अपनों के बीच कुछ दुरियां आ रही है तो समय रहते उस दुरी को खतम कर लीजिए, साथ बैठकर हंसिए, मजाक कीजिए, बातें कीजिए, खिलखिलाइए... और कृपा करके परिवार बचाइए, समाज बचाइए, आचरण बचाइए...
तब विश्व का कल्याण होगा और विश्व में शांति होगी ।

______________________________

#अंतरराष्ट्रीय_परिवार_दिवस
#International_family_day

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

शिक्षा और ज्ञान

संपूर्ण शिक्षा और ज्ञान तब तक व्यर्थ है जब तक वह शिक्षा और ज्ञान मनुष्य के चरित्र और व्यवहार में शामिल ना हो।
- उमराव सिंह 

शनिवार, 23 मार्च 2024

गौरैया के कम होने के कारण

      छई छप्पा छई,छप्पाक छई... बारीश के पानी के साथ खेल खेल की मस्ती या अपने संगी साथी के साथ बारीश में छई छप्पा की मस्ती में जितना आनंद और खुशी है उतनी ही आनंद और खुशी आंगन में चहचहाते चिड़ियों में हैं ये पृथ्वी तमाम जीव-जंतुओं को जीवन देती है और यहां सभी जीव-जंतुओं के निवास स्थान है इसी तरह गौरेया एक घरेलू पक्षी है जो अक्सर घरों में घोसला बनाती हैं हमारे छत्तीसगढ में इसे बाम्हन चिरई कहते हैं... 

      मगर सभी जीव-जंतुओं में तेज मनुष्य आज आधुनिक हैं अपने आप को मॉडर्न कहने लगे हैं और हमारे इसी आधुनिकता और आधुनिकता के साधनों अंधाधुंध उपयोग ने प्रकृति की व्यवस्था को बरबाद कर दिया है, आज के लोग घर में आंगन रखना भी पसंद नहीं कर रहे हैं पुरा घर को ढलाई करके ऊपर से पूरा बंद कर देते हैं ऐसे घर में ठीक से हवा तक नहीं आती, जिस घर में आंगन होता है उस घर की एक अलग ही रौनक होती है। हमारे गांव के घरों में बहुत बड़ा सा आंगन और बीच में तुलसी का चौरा और अनेक पेड़ पौधे हैं वहीं पर हर समय मटकी में पानी रहता है जिससे अनेक प्रकार के चिड़िया स्वत: आकर्षित होते रहते हैं और दिनभर घर में उनका आना-जाना लगा रहता है हर रोज दादा दादी  के जमाने से अंगना (आंगन) में कनकी या भात रख देते हैं जिसे वो अनेक प्रकार के चिड़िया बफर पार्टी की तरह नाच नाच के खाते हैं ।

      हाल ही में 20 मार्च को पुरे विश्व ने "विश्‍व गोरैया दिवस" मनाया है। हम हर रोज अनेक दिवस मनाते हैं वह दिवस हमें उस विषय पर सोचने का अवसर देता है क्योंकि आज के भागादौड़ी के जिन्दगी में मनुष्य को सिर्फ अपना काम और पैसा याद रहता है दुनियादारी से बहुतों को कोई मतलब नहीं है कुछ गिने-चुने जागरूक लोग ही संबंधित विषय की ओर ध्यान देते हैं उसमें भी अस्सी प्रतिशत तो केवल सोशल मिडिया में अपने बात रख के वाहवाही लुटने के बाद भूल जाते हैं कुछ ही महान हृदय के लोग इस धरा में हैं जो इन तमाम जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं, इनके बारे में जागरूकता बढाने के लिए प्रतिवर्ष 20 मार्च को गोरैया दिवस मनाया जाता है। और उसके बाद भूल जाया जाता है इसलिए इसकी संख्या कम हो रही है साल में एक बार आंसू बहा देने से कुछ नहीं होगा।

     इस प्रजाति के साथ साथ बहुत से जीव-जंतुओं की संख्‍या में तेजी से कमी को देखते हुए प्रकृति संबंधित दिवसों का महत्‍व और बढ जाता है। इस समय घरेलू गोरैया की प्रजाति लगभग लुप्‍त होने के कगार पर है। लोगों को अपने लिए महंगा से महंगा कार, बड़ी बड़ी ऐसी बिल्डिंग जिसमें सुकून नहीं हैं इसको पाने के लिए मनुष्य फसलों में अंधाधुंध कीटनाशकों का उपयोग किया है और घरों के आसपास के बाड़ी बगीचे समाप्त हो रहे हैं क्योंकि मनुष्य एक हाथ जमीन के लिए लड़ाई झगड़ा में उतारू हैं, पिछले कुछ वर्षों में गोरैया और बहुत से जीव-जंतुओं की संख्‍या तेजी से घटी है। इसके अलावा मोबाइल और टीवी टावर से होने वाला र‍ेडिएशन भी इनकी संख्या घटने का मुख्‍य कारण तो है, परन्तु आज के समय के अनुसार मोबाइल, टीवी, टावर और आधुनिक साधन भी जरूरी है तो आवश्यकता है प्रत्येक मनुष्य को कम से कम अपने अपने स्तर पर जो भी कर सकते हैं करना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के साथ साथ ब्रह्माण्ड के संपूर्ण जीव-जंतुओं का जीवन भी सुरक्षित रहे।


- उमराव सिंह वर्मा, सेमरिया, बेमेतरा, छत्तीसगढ़

_________________________