शनिवार, 23 मार्च 2024

गौरैया के कम होने के कारण

      छई छप्पा छई,छप्पाक छई... बारीश के पानी के साथ खेल खेल की मस्ती या अपने संगी साथी के साथ बारीश में छई छप्पा की मस्ती में जितना आनंद और खुशी है उतनी ही आनंद और खुशी आंगन में चहचहाते चिड़ियों में हैं ये पृथ्वी तमाम जीव-जंतुओं को जीवन देती है और यहां सभी जीव-जंतुओं के निवास स्थान है इसी तरह गौरेया एक घरेलू पक्षी है जो अक्सर घरों में घोसला बनाती हैं हमारे छत्तीसगढ में इसे बाम्हन चिरई कहते हैं... 

      मगर सभी जीव-जंतुओं में तेज मनुष्य आज आधुनिक हैं अपने आप को मॉडर्न कहने लगे हैं और हमारे इसी आधुनिकता और आधुनिकता के साधनों अंधाधुंध उपयोग ने प्रकृति की व्यवस्था को बरबाद कर दिया है, आज के लोग घर में आंगन रखना भी पसंद नहीं कर रहे हैं पुरा घर को ढलाई करके ऊपर से पूरा बंद कर देते हैं ऐसे घर में ठीक से हवा तक नहीं आती, जिस घर में आंगन होता है उस घर की एक अलग ही रौनक होती है। हमारे गांव के घरों में बहुत बड़ा सा आंगन और बीच में तुलसी का चौरा और अनेक पेड़ पौधे हैं वहीं पर हर समय मटकी में पानी रहता है जिससे अनेक प्रकार के चिड़िया स्वत: आकर्षित होते रहते हैं और दिनभर घर में उनका आना-जाना लगा रहता है हर रोज दादा दादी  के जमाने से अंगना (आंगन) में कनकी या भात रख देते हैं जिसे वो अनेक प्रकार के चिड़िया बफर पार्टी की तरह नाच नाच के खाते हैं ।

      हाल ही में 20 मार्च को पुरे विश्व ने "विश्‍व गोरैया दिवस" मनाया है। हम हर रोज अनेक दिवस मनाते हैं वह दिवस हमें उस विषय पर सोचने का अवसर देता है क्योंकि आज के भागादौड़ी के जिन्दगी में मनुष्य को सिर्फ अपना काम और पैसा याद रहता है दुनियादारी से बहुतों को कोई मतलब नहीं है कुछ गिने-चुने जागरूक लोग ही संबंधित विषय की ओर ध्यान देते हैं उसमें भी अस्सी प्रतिशत तो केवल सोशल मिडिया में अपने बात रख के वाहवाही लुटने के बाद भूल जाते हैं कुछ ही महान हृदय के लोग इस धरा में हैं जो इन तमाम जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं, इनके बारे में जागरूकता बढाने के लिए प्रतिवर्ष 20 मार्च को गोरैया दिवस मनाया जाता है। और उसके बाद भूल जाया जाता है इसलिए इसकी संख्या कम हो रही है साल में एक बार आंसू बहा देने से कुछ नहीं होगा।

     इस प्रजाति के साथ साथ बहुत से जीव-जंतुओं की संख्‍या में तेजी से कमी को देखते हुए प्रकृति संबंधित दिवसों का महत्‍व और बढ जाता है। इस समय घरेलू गोरैया की प्रजाति लगभग लुप्‍त होने के कगार पर है। लोगों को अपने लिए महंगा से महंगा कार, बड़ी बड़ी ऐसी बिल्डिंग जिसमें सुकून नहीं हैं इसको पाने के लिए मनुष्य फसलों में अंधाधुंध कीटनाशकों का उपयोग किया है और घरों के आसपास के बाड़ी बगीचे समाप्त हो रहे हैं क्योंकि मनुष्य एक हाथ जमीन के लिए लड़ाई झगड़ा में उतारू हैं, पिछले कुछ वर्षों में गोरैया और बहुत से जीव-जंतुओं की संख्‍या तेजी से घटी है। इसके अलावा मोबाइल और टीवी टावर से होने वाला र‍ेडिएशन भी इनकी संख्या घटने का मुख्‍य कारण तो है, परन्तु आज के समय के अनुसार मोबाइल, टीवी, टावर और आधुनिक साधन भी जरूरी है तो आवश्यकता है प्रत्येक मनुष्य को कम से कम अपने अपने स्तर पर जो भी कर सकते हैं करना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के साथ साथ ब्रह्माण्ड के संपूर्ण जीव-जंतुओं का जीवन भी सुरक्षित रहे।


- उमराव सिंह वर्मा, सेमरिया, बेमेतरा, छत्तीसगढ़

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