#प्रकृति_से_विनाश : आवश्यकता #प्राकृतिक क्रांति की
- उमराव सिंह
मार्क्सवादी सिद्धांत के अनुसार कार्लमार्क्स इस बात पर जोर देते थे कि शोषक वर्ग द्वारा शोषित वर्ग पर किए गए शोषण के प्रतिक्रियास्वरूप शोषित वर्ग का आधिपत्य स्थापित होता है। इसी तरह आज स्पष्ट नजर आ रहा है कि प्रकृति का भरपूर शोषण हुआ है और हो रहा है । आज मनुष्य शोषक है और प्रकृति शोषित है । औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, सुविधाओं का अनियमित उपयोग से शोषित प्रकृति की प्रतिक्रियास्वरूप आज जलवायु परिवर्तन, बढता हुआ तापमान, चक्रवाती तूफान आदि अनेक आपदाओं से जूझना पड़ रहा है । आज ये चिंतन अत्यंत आवश्यक है कि आने वाली पीढी को हम कैसी दुनिया देने वाले हैं । इसका कारण है कि अतीत से वर्तमान तक मनुष्य ने प्रकृति का अंधाधुंध दोहन किया है। प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग हुआ है। तेजी से हुई इस वैज्ञानिक क्रांति ने जहाँ एक ओर जीवन को सुविधाओं से परिपूर्ण किया वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संतुलन काफी प्रभावित हुआ है, जिसका परिणाम हम सभी कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के रूप में देख रहे हैं । आज पुनः प्रकृति को अपनी संतुलित अवस्था में लाने के लिए व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है, ऐसी जागरूकता जिसे शिक्षा, संचार, फिल्म और तमाम माध्यमों के द्वारा विश्व के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाई जाए, यही प्राकृतिक क्रांति है ।
प्रकृति व मनुष्य का संबंध -
जिस प्रकार हम अपने नातेदारों, दोस्तों से जुड़े होते हैं, वैसे ही हम प्रकृति से भी जुड़े हुए हैं । भारतीय संस्कृति, जनजातीय संस्कृति और आदिम समाजों की संस्कृति में भी प्रकृति पूजा की परंपरा रही है। एशिया, अमेरिका, अफ्रीका की आदिम जनजातियों में व वृहत समाजों में भी पेड़ों की पूजा की जाती है । वास्तव में मनुष्य और प्रकृति का संबंध मनुष्य के सामाजिक संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण और प्राचीन है। प्रकृति व मनुष्य के बीच स्वच्छ संबंध अनिवार्य और आवश्यक है, क्योंकि प्रकृति से प्राप्त होने वाले ऑक्सीजन के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। शरीरक्रिया वैज्ञानिक जेन इंगेनहाउज के अनुसार "पौधों के द्वारा प्रकाश संश्लेषण होता है जिससे ऑक्सीजन गैस निकलती है।" और ऑक्सीजन जीवन के लिए अनिवार्य है। ऐसे ही सभी जीव जन्तुओं, जिसमें हम मनुष्य भी हैं, का संबंध पेड़ों से भी है, क्योंकि धरती में केवल पेड़- पौधे ही हैं जो फल का निर्माण कर सकते हैं। हमारे शरीर के लिए आवश्यक तत्वों कॉर्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन्स और खनिज तत्वों का निर्माण पेड़-पौधों में ही फल के रूप में होता है । जहाँ चावल और मक्का आदि अनाज कॉर्बोहाइड्रेट है वहीं चना, मूंगफली प्रोटीन हैं । तमाम फलों में विटामिन और खनिज तत्व हैं जो प्रकृति व मनुष्य के बीच प्राकृतिक विनिमय अर्थात प्राकृतिक लेनदेन के संबंध को स्थापित करते हैं, यह अनिवार्य संबंध है। दुनिया के तमाम लोगों में इस संबंध में जागरूकता की आवश्यकता है।
परिभाषा :-
मनुष्य के द्वारा किए जाने वाले वे संपूर्ण जागरूकता कार्य जिनसे पर्यावरण में संतुलन स्थापित हो तथा जिनसे सभी जीव-जन्तु, पादप आदि प्रकृति के साथ अनुकूलन स्थापित कर सके उसे प्राकृतिक क्रांति कह सकते हैं।
प्राकृतिक क्रांति के तहत निम्न कार्य करने होंगे :-
1. विश्व के सभी लोग अपने हाथ से एक निश्चित समयांतराल में वृक्षारोपण करें और उसके पालन की जिम्मेदारी समझें ।
2. प्लास्टिक व डिस्पोजल का उपयोग बंद करने की वैधानिक पहल हो ।
3. पेट्रोल, डीजल के अनुचित उपयोग पर रोकथाम पर जोर देना ।
4. ए.सी., फ्रिज के नियोजित उपयोग पर जोर देना ।
5. ध्वनि प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण हेतु उपाय तैयार करना ।
6. विद्युत के दुरुपयोग के प्रति पूर्णतः प्रतिबंध लगाना व निगरानी व्यवस्था दुरुस्त करना ।
7. सौर ऊर्जा का प्रत्येक परिवार तक सुलभ पहुँच बनाने पर कार्य करना।
8. विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय स्तर पर छात्रों द्वारा प्राकृतिक जागरूकता कार्यक्रम चलाना व स्वयं जागरूक होना ।
9. शोधकर्ताओं द्वारा प्राकृतिक संतुलन संबंधी शोध को बढावा देना।
10, संत महात्माओं द्वारा अपने प्रवचनों में प्रकृति के प्रति जागरूकता के लिए व वृक्षारोपण के लिए अपील करना व स्वयं मिलकर वृक्षारोपण व प्रकृति संबंधी कार्य कराना।
11. प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पहले से ही प्राकृतिक जागरूकता के कार्यक्रम प्रसारित कर ही रहे हैं, इसे जमीनी तौर पर कार्यरूप देना।
12. शासन, प्रशासन और न्यायालय ऐसे वस्तुओं के तमाम उपयोग पर रोक लगाए जिनसे प्रकृति का शोषण हो रहा है।
13. जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा के प्रति लोग गंभीर बनें।
14. फिल्मों व टीवी कार्यक्रमों में प्राकृतिक जागरूकता के कार्यक्रम तैयार करके लोगों को प्रेरित करना।
इस तरह प्राकृतिक जागरूकता को प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाना होगा और प्रकृति को अपने प्रिय मित्र या प्रिय नातेदारों में शामिल करना होगा । तात्पर्य यह कि किसी भी तरह से हर व्यक्ति प्रकृति के महत्व को समझ जाएँ।
प्राकृतिक क्रांति के अग्रदूत :-
इस कार्यक्रम के लिए विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को मिलकर एक मॉडल के तहत काम करना होगा । लोग अपने-अपने समूह में या स्वतंत्र रूप से भी पर्यावरण संबंधी काम कर सकते हैं। इसमें महत्वपूर्ण भूमिका सभी देशों की सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की है, प्रत्येक देश के प्रत्येक व्यक्ति की है। इसमें छात्र, महिला, मजदूर, किसान, युवा, व्यापारियों की भागीदारी अनिवार्य है । सरकार और जनता को मिलकर प्रकृति के प्रति प्रतिबद्ध होना होगा। सुबह की हवा को लाख रूपए की दवा कहा जाता है, इस अत्यंत महंगी दवा को, जो आज मुफ्त में उपलब्ध है, इसको भविष्य के लिए सुरक्षित रखना होगा। सभी लोगों के ध्यान में रहे कि प्रकृति हमारे परिवार का एक प्यारा सदस्य है और उसकी सुरक्षा हम सब का कर्तव्य है।
प्राकृतिक क्रांति : एक उदाहरण :-
डिस्पोजल के दुष्प्रभाव के प्रति जागरूकता के लिए हमारे लगभग बीस भाई-बहनों के द्वारा एकसाथ मिलकर निःशुल्क चाय वितरण का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है । इस कार्यक्रम के तहत पिछले पांच वर्षों से संत समागम मेला में चार दिन तक लगभग 40 हजार लोगों को नि:शुल्क चाय का वितरण स्टील के कप में किया जाता है । इसके साथ-साथ डिस्पोजल व प्लास्टिक से होने वाले दुष्प्रभाव के प्रति लोगों को जागरूक किया जाता है । इसकी जागरूकता के लिए पोस्टर प्रदर्शनी आयोजित की जाती है । और लोग आपस में कप में चाय पीते हुए प्लास्टिक व डिस्पोजल के दुष्प्रभाव के प्रति समूह चर्चा भी करते हैं ।
इस कार्यक्रम का प्रभाव इतना अवश्य हुआ है कि इस क्षेत्र में लोगों के हाथों में अचानक डिस्पोजल आ जाने पर दिमाग में यह बात अवश्य आती है कि यह उचित नहीं है । यह स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक है । लोग अवश्य जागरूक हो रहे हैं अपने बच्चों को बिल्कुल मना करते हैं कि डिस्पोजल या प्लास्टिक का उपयोग मत करो। इस कार्यक्रम को प्रारंभ करने वाले मेरे साथियों में श्री चित्रेन्द वर्मा , श्री विक्रांत वर्मा , श्री कौशल वर्मा , श्री अशोक वर्मा , श्री ललित वर्मा , श्री गैंदराम वर्मा , श्री प्रहलाद सिंह वर्मा , श्री सतीश वर्मा , अधिवक्ता, श्रीमती गौरी वर्मा और इस क्षेत्र के लगभग पचास युवा हैं जिन के सहयोग से यह जागरूकता कार्यक्रम सफल होता है । इस तरह के जागरूकता उत्पन्न करने संबंधी कार्य पूरे विश्व में होना आवश्यक है। ऐसे प्रयासों से प्राकृतिक क्रांति को सफल बनाना होगा ।
आलेख लेखक *- उमराव सिंह
बेमेतरा, छत्तीसगढ़, भारत
umraosinghverma.blogspot.com
पर स्वप्रकाशित
05 जून 2020 _विश्व पर्यावरण दिवस_

प्रेरक आलेख ।
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा लेख है उमराव जी। ऐसे लेख का हमे और ििइंतेजार रहेगा। धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंबहुत बढ़िया पोस्ट है। आपने प्राकृतिक नियमों में मार्क्सवादी चेतना ढूंढ निकाली है । बहुत बहुत बधाई ।
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