शुक्रवार, 19 अप्रैल 2024

शिक्षा और ज्ञान

संपूर्ण शिक्षा और ज्ञान तब तक व्यर्थ है जब तक वह शिक्षा और ज्ञान मनुष्य के चरित्र और व्यवहार में शामिल ना हो।
- उमराव सिंह 

शनिवार, 23 मार्च 2024

गौरैया के कम होने के कारण

      छई छप्पा छई,छप्पाक छई... बारीश के पानी के साथ खेल खेल की मस्ती या अपने संगी साथी के साथ बारीश में छई छप्पा की मस्ती में जितना आनंद और खुशी है उतनी ही आनंद और खुशी आंगन में चहचहाते चिड़ियों में हैं ये पृथ्वी तमाम जीव-जंतुओं को जीवन देती है और यहां सभी जीव-जंतुओं के निवास स्थान है इसी तरह गौरेया एक घरेलू पक्षी है जो अक्सर घरों में घोसला बनाती हैं हमारे छत्तीसगढ में इसे बाम्हन चिरई कहते हैं... 

      मगर सभी जीव-जंतुओं में तेज मनुष्य आज आधुनिक हैं अपने आप को मॉडर्न कहने लगे हैं और हमारे इसी आधुनिकता और आधुनिकता के साधनों अंधाधुंध उपयोग ने प्रकृति की व्यवस्था को बरबाद कर दिया है, आज के लोग घर में आंगन रखना भी पसंद नहीं कर रहे हैं पुरा घर को ढलाई करके ऊपर से पूरा बंद कर देते हैं ऐसे घर में ठीक से हवा तक नहीं आती, जिस घर में आंगन होता है उस घर की एक अलग ही रौनक होती है। हमारे गांव के घरों में बहुत बड़ा सा आंगन और बीच में तुलसी का चौरा और अनेक पेड़ पौधे हैं वहीं पर हर समय मटकी में पानी रहता है जिससे अनेक प्रकार के चिड़िया स्वत: आकर्षित होते रहते हैं और दिनभर घर में उनका आना-जाना लगा रहता है हर रोज दादा दादी  के जमाने से अंगना (आंगन) में कनकी या भात रख देते हैं जिसे वो अनेक प्रकार के चिड़िया बफर पार्टी की तरह नाच नाच के खाते हैं ।

      हाल ही में 20 मार्च को पुरे विश्व ने "विश्‍व गोरैया दिवस" मनाया है। हम हर रोज अनेक दिवस मनाते हैं वह दिवस हमें उस विषय पर सोचने का अवसर देता है क्योंकि आज के भागादौड़ी के जिन्दगी में मनुष्य को सिर्फ अपना काम और पैसा याद रहता है दुनियादारी से बहुतों को कोई मतलब नहीं है कुछ गिने-चुने जागरूक लोग ही संबंधित विषय की ओर ध्यान देते हैं उसमें भी अस्सी प्रतिशत तो केवल सोशल मिडिया में अपने बात रख के वाहवाही लुटने के बाद भूल जाते हैं कुछ ही महान हृदय के लोग इस धरा में हैं जो इन तमाम जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं, इनके बारे में जागरूकता बढाने के लिए प्रतिवर्ष 20 मार्च को गोरैया दिवस मनाया जाता है। और उसके बाद भूल जाया जाता है इसलिए इसकी संख्या कम हो रही है साल में एक बार आंसू बहा देने से कुछ नहीं होगा।

     इस प्रजाति के साथ साथ बहुत से जीव-जंतुओं की संख्‍या में तेजी से कमी को देखते हुए प्रकृति संबंधित दिवसों का महत्‍व और बढ जाता है। इस समय घरेलू गोरैया की प्रजाति लगभग लुप्‍त होने के कगार पर है। लोगों को अपने लिए महंगा से महंगा कार, बड़ी बड़ी ऐसी बिल्डिंग जिसमें सुकून नहीं हैं इसको पाने के लिए मनुष्य फसलों में अंधाधुंध कीटनाशकों का उपयोग किया है और घरों के आसपास के बाड़ी बगीचे समाप्त हो रहे हैं क्योंकि मनुष्य एक हाथ जमीन के लिए लड़ाई झगड़ा में उतारू हैं, पिछले कुछ वर्षों में गोरैया और बहुत से जीव-जंतुओं की संख्‍या तेजी से घटी है। इसके अलावा मोबाइल और टीवी टावर से होने वाला र‍ेडिएशन भी इनकी संख्या घटने का मुख्‍य कारण तो है, परन्तु आज के समय के अनुसार मोबाइल, टीवी, टावर और आधुनिक साधन भी जरूरी है तो आवश्यकता है प्रत्येक मनुष्य को कम से कम अपने अपने स्तर पर जो भी कर सकते हैं करना चाहिए। ताकि हमारे जीवन के साथ साथ ब्रह्माण्ड के संपूर्ण जीव-जंतुओं का जीवन भी सुरक्षित रहे।


- उमराव सिंह वर्मा, सेमरिया, बेमेतरा, छत्तीसगढ़

_________________________

शुक्रवार, 31 मार्च 2023

*युगों से सीखना और आज को संवारना है*

त्रेतायुग के समय अपने देश या अपने राज्य छत्तीसगढ़ के जमीन पर क्या क्या हुआ, इस इतिहास को जानना जितना महत्वपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि हम उस त्रेतायुग और द्वापरयुग से शिक्षा लेकर हम अपने वर्तमान को ठीक करें...

 *क्योंकि हम सभी को आज में जीना है हमें अपने आज के समाज और आज के अपने परिवार में रहकर जीवन बिताना है इसलिए जरूरी है कि हम अपने आज के परिवार और समाज में नकारात्मक बदलाव जो हो रहा है मतलब सामाजिक पारिवारिक विघटन । उसी के सुधार के लिए ही धार्मिक पौराणिक तथ्यों से* *नैतिक शिक्षा लेकर अपने वर्तमान के नकारात्मक परिस्थिति को ठीक कर सके, शायद इसीलिए जगह जगह भागवत, प्रवचन और तमाम तरह के धार्मिक अनुष्ठान हम कराते हैं ताकि ईश्वर के दया से हमारा आज और आने वाला कल अच्छा रहे, शायद इसी उम्मीद से हर परिवार अपने बच्चों का विवाह *रामनवमीं में या धार्मिक महत्व के दिनों में करते हैं और अपने बेटा - बहू में या बेटी - दामाद में भगवान श्रीराम चन्द्र जी, और माता सीता या भगवान शिव- पार्वती की छवि देखते हैं और अच्छे भविष्य की कामना करते हैं ।* 
 *परसो मैं न्यायालय में एक परिवार का तलाक और भरण-पोषण की सुलह समझौता का काम कर रहा था उसी समय आफिस के बाहर एक परिवार का शादी का बाजा बजते हुए जा रहा था क्योंकि कल बहुत से जगहों में तेल था तो तेल या माटी कोडने जा रहे थे और बिहाव का बाजा सूनकर मन में एक अलग ही बिहाव रस आता है।* 
 *तो अचानक मेरे मन में ये ख्याल आया कि एक तरफ शादी हो रही है और दूसरी तरफ शादीयां टूट रही है* ।

 *हे मालिक ! आपने ये कैसी परिस्थितियों का निर्माण किया है कि विवाह का बंधन कमजोर होता जा रहा है और शादीयां टुट रही है।* 

 *क्यों आज के बेटे में राम नहीं है और बेटी में सीता नहीं है ? इसका कारण क्या है ? और हम टुटते हुए परिवारों को कैसे कम कर सकते हैं ? लाखों रूपयों का खर्च करके जीवन भर के मेहनत से जुटाई गई पैसे से माता-पिता शादी ब्याह करते हैं और कुछ ही दिनों में और कुछ ही महीनों में तलाक आदि की स्थिति आ जाती है *हम सभी को इस पर मनन, चिंतन और मेहनत करनी चाहिए, यदि हमें अपने बच्चों का अच्छा भविष्य देखना है।* 

 *- उमराव सिंह, काउंसलर, बेमेतरा* *दिनांक 31/03/2023* 

🙏🏻 *©umraosingh__________________________*

सोमवार, 27 मार्च 2023

जमीन की खरीदी बिक्री में धोखाधड़ी

जमीन की खरीदी बिक्री में अनेक तरह के डाक्यूमेंट्स की जांच पड़ताल करनी पड़ती है और तमाम तरह की सावधानियों के बाद भी लोग धोखे का शिकार हो रहे हैं। जमीन खरीदी बिक्री से संबंधित धोखाधड़ी क्या अंत है?

किसी कवि ने लिखा है कि

"कोई वकालत नहीं चलती *जमीन वालों की* , 

"कोई वकालत नहीं चलती *जमीन वालों की,* 

जब कोई फैसला आसमान वाला करता है।"

हजारों ऐसे हकीकत किस्से सुने होंगे जिसमें कहा जाता है कि जो आदमी जमीन के साथ धोखा करता है उस जमीन से बनाया गया सम्पत्ति उसका सब कुछ नाश कर देता है या किसी न किसी तरिके से बराबर कर देता है। उससे मिला हुआ धन कभी भी फलता फूलता नहीं है।

      जमीन के धोखाधड़ी अक्सर भाई भाई में भी होता है बंटवारे में धोखाधड़ी, जमीन के लेन-देन में धोखाधड़ी करने वाले ऐसे अनेक परिवार हम सब देखे होंगे जो धोखा से पचासों एकड़ जमीन और सम्पत्ति बना लिए, उनका बेटा बहु बिमारी में बरबाद हो गए, बेटा बहु, नाती, पत्नी का कैंसर, दमा और सुगर आदि बिमारियों से मृत्यु हो गया, कुछ बचें हैं वो सड़क दुघर्टना में अपाहिज फिर रहे हैं।  बेटे शराब के नशे में धुत कई बार सड़क हादसे में मरते मरते बच रहे हैं धोखाधड़ी से कमाया गया एक रूपिया भी कभी फलता फूलता नहीं है ।

      क्या मतलब उस सम्पत्ति का जिसका चैन से सुख नहीं ले पाया, क्या मतलब वो जमीन जो कुल का नाश कर दिया, धोखा से बनाई गई सम्पत्ति का हिसाब ऊपर वाला कर ही देता है वो किसी का हिसाब बाकि नहीं रखता ।

     लोग अपने खून पसीने की कमाई से जमीन खरीदते हैं आने वाले बच्चों के लिए घर-द्वार, रोजी-रोटी का सहारा बनाते हैं । और कुछ लोग उस जमीन के लेन-देन में धोखाधड़ी करके अक्सर एक परिवार को परेशानी में डाल देते हैं फिर को परिवार को उसके कारण भटकना पड़ जाता है।

     इस प्रकृति के पांच तत्वों आग, पानी, धरती, आकाश और वायु के साथ धोखा नहीं कर सकते, यदि मनुष्य थोड़ा भी चालाकी करके इन पांच तत्वों के साथ यदि धोखा करता है तो उसका न्याय यदि नीचे वाला न्यायालय भी ना कर सके, तो ऊपरवाला अवश्य करता है।

हम सभी ने स्कूल में सदगुरु कबीर साहब की वाणीवचन अवश्य पढ़ें हैं

वे कहते हैं कि - 

साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये ।

मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू ना भूखा जाए ।

सदगुरु कबीर साहब कहते हैं कि हे प्रभु मुझे ज्यादा धन और संपत्ति नहीं चाहिए, मुझे केवल इतना ही चाहिए जिसमें मेरा परिवार अच्छे से खा सके। मैं भी भूखा ना रहूं और मेरे घर से कोई भूखा ना जाये।

ये संतुष्टि ही सबसे बड़ा धन है मगर आज लखपति, करोड़पति भी संतुष्ट नहीं है ये दुख की बात है। पृथ्वी में हाहाकार मचा हुआ है जमीन, जायदाद के लिए ।

- उमराव सिंह

_____________________

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

संस्कारों से ही बचेंगे टूटते परिवार

        आज परिवार का स्वरुप छोटा होता जा रहा है और आधुनिकता के युग के नाम पर बच्चों में इंटरनेट का अनावश्यक उपयोग, दौड़ती हुई जिंदगी आदि के कारण बच्चों पर नियंत्रण के माध्यम कम होता जा रहा है| संसार की समस्त सभ्यताओं में भारतीय संस्कार ही सबसे उत्तम माना गया है, क्योंकि इसी संस्कार ने बड़े-बड़े बुद्धजीवीयों, देशभक्तों, महान समाज सुधारकों को जन्म दिया है, परन्तु आज यही भारतीय परिवार लगभग हर तरफ तेजी से टूटता हुआ नज़र आता जा रहा है| टूटते हुए परिवारों की संख्या तो बढ़ ही रही है साथ साथ इन परिवारों के सदस्यों में आपसी प्रेमभाव की कमी और सामंजस्यता का नहीं होना, धूम्रपान और मद्यपान का सेवन आदि आपराधिक प्रवित्तियों को पैदा करता जा रहा है |
        भारतीय शाकाहारी भोजन स्वास्थ्य के लिए सबसे उत्तम है और कहा गया है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क होता है और जब मानव मस्तिष्क शांत और स्वस्थ होगा, तब वह मानव की तमाम आपराधिक प्रवृत्तियां स्वतः समाप्त हो जाएगी और तब होगा विश्व में शांति | 
         विश्व में शांति हो, विश्व का कल्याण हो, यह मनोकामना ऐसे ही नहीं आएगी हमें अपने घर से प्रारंभ करना होगा, जब हमारा एक परिवार शांत और सुखी रहेगा | तब समाज, देश और विश्व में शांति होगी, परंतु आज लगभग हर पड़ोसी में किसी न किसी बात से अशांति है | आज के लगभग अधिकतर परिवारों में शराब, गुटका, मांसाहार और वाणी में अपशब्द और गाली गलौज है | हम जितने सम्मान पूर्वक और प्रेम से बाहर वालों से बात करते हैं उतने प्रेम से घर वालों से बात नहीं करते बल्कि घर वालों से बात करने या माता-पिता भाई-बहन से कुछ पूछे जाने पर चिड़चिड़ाहट युक्त आवाज मुंह से निकलती है | हम जितना समय और अपने काम और बाहर को देते हैं घर परिवार को नहीं देते |
आज की पीढ़ी अपने घर में माता-पिता का नहीं सुनते तो बाहर वालों की बात का अनुसरण हो जाने की कल्पना नहीं की जा सकती| आज भोजन के हर निवाले में विशेष प्रकार के रसायन हैं, केमिकल कीटनाशक है, एक बेफिजूल खर्चा भी है कि हम अधिक पैदावार के लिए फसलों में नई-नई रसायन का उपयोग कर रहे हैं| यह रसायन मानव शरीर को रोगी बनाने के साथ-साथ मिट्टी, पानी, हवा, भोजन सबको प्रभावित या बीमार कर रहा है और बीमार मस्तिष्क में ही अपराध प्रवित्ति पैदा होता है तो इस रसायनों पर खर्च करके हमें क्या मिला? रोग, कमजोरी और फिर अशांति | आज आवश्यक हो गया है कि हम नैतिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक कृषि या प्राकृतिक कृषि की ओर बढ़े, जिसमें किसी भी रसायन का उपयोग ना हो, और शिक्षा, कृषि, व्यवहार आदि में नैतिकता युक्त संस्कार को शामिल करके ही विश्व में शांति लाई जा सकती है | मानव जीवन में शिक्षा का उद्देश्य केवल बड़ी बड़ी मशीन तैयार करना नहीं है| रोबोट शेयर बाजार और अंधाधुन चकाचौंध में नहीं है बल्कि शिक्षा का उद्देश्य लोगों के बीच आपसी भाईचारा, समझ, प्रेम और शांति निश्चित करना है कोई देश कितना भी बड़ा अर्थव्यवस्था बन जाए, यदि वहां के लोगों में चैन और सुकून की नींद नहीं है और सुकून भरा जीवन नहीं है तो तमाम वैज्ञानिक विकास बेकार है इसलिए जीवन के हर क्षेत्र में माननीय संस्कार की आवश्यकता है यदि हम मानव हैं तो मानव होने का लक्षण विकसित करना जरूरी है एक सभ्य समाज में असभ्यता का आ जाना एक बहुत बड़ा दाग है वह दाग हमें अपने भोजन और जीवन और विश्व के प्रति गंभीर नहीं होने का प्रमाण देता है |

– उमराव सिंह
ग्राम- सेमरिया (जिला- बेमेतरा) छत्तीसगढ़

Reference : umrao singh verma, www.dharmavani.com 08/04/2022

मंगलवार, 1 मार्च 2022

सद्गुरु कबीर साहब की वाणीवचन Sadguru Kabir Sahab

 

जिस दिन पूरी दुनिया सद्गुरु कबीर साहब के बताएं मार्ग पर चलने लग जाएगी, जिस दिन संसार का हर एक एक इंसान सद्गुरु कबीर साहब के वाणीवचनों को समझकर उसी मार्ग का अनुसरण और अनुकरण करने लगेगा, ना किसी परिवार में और ना ही कहीं दुनिया में लड़ाई झगड़ा, कोर्ट कचेहरी और महा भयानक युद्ध का नौबत नहीं आएगी |
🙏 सादर सप्रेम साहेब बंदगी 🙏

- #उमराव_सिंह_वर्मा_सामाजिक_मानववैज्ञानिक

The day the whole world will start following on the path told by Sadguru Kabir Sahib, on the day every single person in the world will understand the words of Sadguru Kabir Sahib and follow the same path, neither in any family nor in the world. There will be no quarrel, courtroom and great terrible war.

Regards Saprem Saheb Bandgi🙏

- #Umrao_Singh_Verma_Social_Anthropologist

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

इस साल कुछ अलग होली



इस बार होली कुछ अलग ढंग से मनाइए, यह एक पावन त्यौहार है बस सब खुद से एक वादा कीजिए कि इस होली में शराब नहीं पिएंगे, नशा नहीं करेंगे, बल्कि अपने अपने गांव में खुशी से होली मिलन समारोह मनाएंगे, होली मिलन समारोह लिखा हुआ एक बैनर बनाइये जिसे गांव के मुख्य चौक में लगा दीजिए, नीचे नंगारा के साथ फाग गीत का माहौल बनाइये, डंडा नृत्य का आयोजन कीजिए क्योकि धीरे धीरे शराब के कारण फाग गीत और डंडा नृत्य विलुप्त हो रहा है | वहीं आसपास कुर्सियां सजा सकते हैं जिसके सामने खूब सारे रंग बिरंगे ग़ुलाल को सजाकर रख  सकते हैं हो सके तो फाग गीत के लिए साउंड सिस्टम की व्यवस्था कर सकते है एक अच्छी संस्कृति को संस्कार के साथ मनाएं और फाग और डंडा नृत्य के सुन्दर माहौल में सब साथ बैठिए,और रंग ग़ुलाल का आनंद लीजिए... 


उमराव सिंह वर्मा 

गोल्डमेडल, सामाजिक मानववैज्ञानिक 

🙏🙏🙏🙏