*ओले हैं, या जवाब अत्याचार का...*
- _उमराव सिंह_
तेज धुप था, बस थोडी ही देर में तेज बारिश और वो भी खुब बर्फ मतलब ओले और तुफान के साथ...
हम बाजार के एक कोने पर रूक गए.. बारिश, तूफान और बरफ के भयानकता को देखकर ध्यान उस इंसान की ओर जा रहा था जो उस समय बाहर खेत खलिहान में रहा होगा और आसपास छुपने का कोई ठिकाना नहीं रहा होगा, उस पर क्या बीती होगी...
इस बात को अधिकतर लोग जानते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है हर बच्चे के स्कूल कॉलेज के कोर्स में पढाया जा रहा है...
फिर भी डिस्पोजल, पॉलीथिन आदि का उपयोग कम ही नहीं हो रहा है वृक्षारोपण पर गंभीरता बिल्कुल नहीं है पेट्रोल और डीजल का उपयोग ऐसा बढा कि गांव तरफ लोग तालाब भी बाइक में जाते हैं कार्बन डाइऑक्साइड, या फ्रिज एसी से निकलने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन के स्तर को कम करने का वचन लेने का कर्तव्य, डिस्पोजल या पॉलिथीन का उपयोग बंद करने कर्तव्य केवल सरकार का नहीं, हम तमाम लोगों का है फ्रिज और ए.सी.(एयरकंडीशनर) के बिना लोग रह नहीं पा रहे हैं आधा घण्टा लाइट चली जाए तो बिजली आफिस में सैकड़ों फोन चली जाती है, आज हम अत्यंत सुविधाभोगी हो चुके हैं मिट्टी के फर्स पर टाइल्स बिछा रहे हैं ये सब केवल अपनी सुविधा के लिए ताकि झाडु कम लगाना पडे, टाइल्स लगाओ, बर्तन कम धोना पडे डिस्पोजल लाओ.. जरा अंदाज़ा लगा सकते हैं कि केवल हमारे देश की जनसंख्या सवा अरब है इसमें से केवल पचास प्रतिशत लोग ही दिन में केवल एक पॉलिथीन या डिस्पोजल उपयोग करते होंगे तो केवल एक दिन में कितना प्लास्टिक जमीन पर बिछाया जा रहा है...
इस तरह की सुविधाओं ने प्रकृति को चैन की सांस लेने के लायक नहीं छोडा है और जनजीवन के लिए खतरा बनता जा रहा है और जितनी तेजी से वातावरण पिछले कुछ ही वर्षों में परिवर्तित हुई है विकराल रूप ले रहा है शायद ही सैकड़ों साल पहले ऐसा हुआ होगा...
प्रकृति आज बरफ और तुफान के रूप में चीख चीख कर कह रही है कि अभी भी वक्त है, सुधर जाओ, फेंक दो उन तमाम चीजों को जो प्रकृति का विनाश कर रही है... बडे नहीं तो कम से कम पढने लिखने वाले बच्चे समझें... कम दुरी में जाना हो तो गर्व के साथ सायकल ही चलाइए, सायकल चलाने में शर्म मत कीजिए कि हम ये हैं, वो हैं, फलाना हैं, ढिकाना हैं तो सायकल कैसे चलाएंगे.. ऐसा मत सोचें बल्कि सुरक्षित भविष्य के लिए ये करना ही होगा, हम जाने अन्जाने वास्तव में अत्याचार ही कर रहे हैं प्रकृति के साथ...
आज हम सभी को प्रकृति के प्रति गंभीर होने की अत्यंत आवश्यकता है और ये हम सभी का कर्तव्य है तभी कल, हम और हमारे आने वाली पीढी सुकून की सांस ले पाएगी...
- उमराव सिंह,
umraosinghverma.blogspot.com
- _उमराव सिंह_
तेज धुप था, बस थोडी ही देर में तेज बारिश और वो भी खुब बर्फ मतलब ओले और तुफान के साथ...
हम बाजार के एक कोने पर रूक गए.. बारिश, तूफान और बरफ के भयानकता को देखकर ध्यान उस इंसान की ओर जा रहा था जो उस समय बाहर खेत खलिहान में रहा होगा और आसपास छुपने का कोई ठिकाना नहीं रहा होगा, उस पर क्या बीती होगी...
इस बात को अधिकतर लोग जानते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है हर बच्चे के स्कूल कॉलेज के कोर्स में पढाया जा रहा है...
फिर भी डिस्पोजल, पॉलीथिन आदि का उपयोग कम ही नहीं हो रहा है वृक्षारोपण पर गंभीरता बिल्कुल नहीं है पेट्रोल और डीजल का उपयोग ऐसा बढा कि गांव तरफ लोग तालाब भी बाइक में जाते हैं कार्बन डाइऑक्साइड, या फ्रिज एसी से निकलने वाले क्लोरोफ्लोरो कार्बन के स्तर को कम करने का वचन लेने का कर्तव्य, डिस्पोजल या पॉलिथीन का उपयोग बंद करने कर्तव्य केवल सरकार का नहीं, हम तमाम लोगों का है फ्रिज और ए.सी.(एयरकंडीशनर) के बिना लोग रह नहीं पा रहे हैं आधा घण्टा लाइट चली जाए तो बिजली आफिस में सैकड़ों फोन चली जाती है, आज हम अत्यंत सुविधाभोगी हो चुके हैं मिट्टी के फर्स पर टाइल्स बिछा रहे हैं ये सब केवल अपनी सुविधा के लिए ताकि झाडु कम लगाना पडे, टाइल्स लगाओ, बर्तन कम धोना पडे डिस्पोजल लाओ.. जरा अंदाज़ा लगा सकते हैं कि केवल हमारे देश की जनसंख्या सवा अरब है इसमें से केवल पचास प्रतिशत लोग ही दिन में केवल एक पॉलिथीन या डिस्पोजल उपयोग करते होंगे तो केवल एक दिन में कितना प्लास्टिक जमीन पर बिछाया जा रहा है...
इस तरह की सुविधाओं ने प्रकृति को चैन की सांस लेने के लायक नहीं छोडा है और जनजीवन के लिए खतरा बनता जा रहा है और जितनी तेजी से वातावरण पिछले कुछ ही वर्षों में परिवर्तित हुई है विकराल रूप ले रहा है शायद ही सैकड़ों साल पहले ऐसा हुआ होगा...
प्रकृति आज बरफ और तुफान के रूप में चीख चीख कर कह रही है कि अभी भी वक्त है, सुधर जाओ, फेंक दो उन तमाम चीजों को जो प्रकृति का विनाश कर रही है... बडे नहीं तो कम से कम पढने लिखने वाले बच्चे समझें... कम दुरी में जाना हो तो गर्व के साथ सायकल ही चलाइए, सायकल चलाने में शर्म मत कीजिए कि हम ये हैं, वो हैं, फलाना हैं, ढिकाना हैं तो सायकल कैसे चलाएंगे.. ऐसा मत सोचें बल्कि सुरक्षित भविष्य के लिए ये करना ही होगा, हम जाने अन्जाने वास्तव में अत्याचार ही कर रहे हैं प्रकृति के साथ...
आज हम सभी को प्रकृति के प्रति गंभीर होने की अत्यंत आवश्यकता है और ये हम सभी का कर्तव्य है तभी कल, हम और हमारे आने वाली पीढी सुकून की सांस ले पाएगी...
- उमराव सिंह,
umraosinghverma.blogspot.com
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें