शीर्षक - "प्रकृति के सामने"
हम मनुष्य हैं,
कहाँ पर मनुष्य हैं ?
हम तो
कोई भारतीय हैं, कोई अमेरिकन हैं,
कोई युरोपी, कोई एशियन
कोई जाति है, कोई जनजाति
हम मनुष्य हैं,
कहाँ पर हैं ?
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने,
उस सत्य के सामने,
न कोई भारतीय हैं, न कोई अमेरिकन,
न कोई युरोपी, न कोई एशियन
न अफ्रिकन
न कोई जाति है, न कोई जनजाति
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने ।
हमारी सांसे हैं, पेडों से,
हमारा जीवन है, प्रकृति से,
हम संतान हैं, प्रकृति के,
हमारा पालक, प्रकृति है,
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने ।
कर्तव्य है हमारा,
हम समझें इसकी महत्ता को,
हम संवारें इसकी सुंदरता को,
हम मिलकर इसका सहयोग करें,
इसे सदा स्वच्छ रखने का प्रण करें,
हम मनुष्य हैं,
प्रकृति के सामने।
प्रकृति का सारा संसार है,
पेंड पौधे जीव जन्तु,
जल थल आकाश के वासी,
सब प्रकृति के निर्माण हैं,
हम सब एक साथी है,
एक दुसरे का साथ,
कोई विकसित नहीं,
न कोई विकासशील हैं,
क्योंकि,
हम केवल मनुष्य हैं, प्रकृति के सामने।
- उमराव सिंह
Blog -
umraosinghverma.blogspot.com

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