"Wine is a Social Dysnomia"
"शराब एक सामाजिक विकृति"
- उमराव सिंह
प्रस्तावना एवं अर्थ :- आपने एक शब्द "डिसॉर्डर" सुने और पढें हैं विज्ञान में डिसॉर्डर एक शारीरिक विकृति है डिसॉर्डर जैसा ही फिजियोलॉजी में एक शब्द Dysnomia डिस्नोमिया है जिसमें जब दिमाग ठीक से काम नहीं करता, या किसी चीज को याद रखने की क्षमता कम हो जाती है अर्थात मानसिक विकृति ऐसे ही शराब एक सामाजिक डिस्नोमिया बन चुका है या सामाजिक बुराई कह सकते हैं । जिस तरह शरीर को बिमारियां लगती है वैसे ही समाज को भी बीमारियां लगती है नशा, दहेज, हिंसा, मांसाहार ये सब सामाजिक बिमारियां है जिसे सोशल डिस्नोमिया कह सकते हैं ।
परिभाषा :- मानव समुदाय में व्याप्त वह नकारात्मक तत्व जो समाज की व्यवस्था को विकृत कर देती है और मनुष्य की सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है। और उसकी सत्य को पहचानने की क्षमता एवं चिंतन करने की क्षमता कमजोर पड जाती है या नैतिक शिक्षा की कमी से विकसित ही नहीं हो पाती ।
विवेचना :- कल शराब शुरू हुआ और लम्बी लाइन भी लग गई, दिनभर फेसबुक में शराब के विरोध और शराबबंदी की मांग की हजारों आवाज उठी है लोग सोशल मिडिया में भर भर के शराब का विरोध किए, मगर शराब नहीं रूका, जिसको बेचना है बेच लिया जिसको पीना है पी लिया,
आज का समय कोरोना के कारण खतरनाक है ये बात लगभग सभी जानते हैं जिसके हाथ में मोबाइल है सोशल मीडिया है और जो टीवी के सामने बैठा है वो जानता है कि अभी कोरोना अत्यंत खतरनाक है लेकिन क्या वो आदमी भी उस लाइन में नहीं खडा है जो सबकुछ जानता है ? जब वो जानबूझकर लाइन में खडा है तो जो नहीं जानता वो किसी को क्यों महत्व देंगे...
इसमें बात केवल समझ की है
जो शराब के लिए लाइन में खडा उसको स्वयं के सम्मान की चिंता नहीं है उसको कोई फर्क नहीं पडता कि शराब लेते चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे, इस सम्मान का परवाह रहता तो वह खरीदने ही क्यों जाता,
शराबबंदी करो, हम पुरजोर विरोध करते हैं, ये गलत हो रहा है ऐसी ऐसी बातें केवल फेसबुक में लिख देने से क्या शराब बंद हो जाएगी।
आज कोरोना है इसलिए शराब के विरोध में आवाजें उठी हैं क्या इससे पहले किसी ने विरोध किया ?
मात्र हाथ जोडकर निवेदन करने से सुधार नहीं होता, उसके लिए कर्म करना पडता है
आज हमें ये चिंतन करने की जरूरत है कि शराब लोगों के दिमाग से कैसे निकले,
दुध देने वाली गाय को कोई जंगल में छोड कर नहीं आता, शराब दुध दे रही है जिस दिन दुध देना बंद कर देगा उस दिन शराब स्वतः खतम हो जाएगा मतलब जिस दिन लोग शराब खरीदना बंद कर देंगे उस दिन स्वतः शराब का हौसला टुट जाएगा
शराब के लिए जो लम्बी लाइन लगी हुई है उसका कारण शिक्षा की कमी है उसका कारण उसमे समझ की कमी है उसका कारण अपने सम्मान की चिंता की कमी है
केवल नाम गांव लिखने आ जाने से आदमी समझदार नहीं हो जाता, केवल साक्षरता को बढाने से समझदारी नहीं आएगी, लोगों में वास्तविक नैतिक शिक्षा का होना आवश्यक है
केवल नैतिक शिक्षा ही ऐसा हथियार है जिससे मानव समाज शराब को स्वतः छोड देगा फिर किसी आंदोलन की जरूरत नहीं पडेगी,
आज शराब इसलिए बिका है क्योंकि लाखों लोग इस खतरनाक समय में भी लाइन में लगकर शराब खरीदना पीना को गलत नहीं समझे हैं मतलब उसके दिमाग में इतनी समझ नहीं है कि हम शराब ना खरीदे,
तो ये सोचिए कि ऐसा स्थिति कैसे पैदा हो कि एक आदमी का हृदय शराब खरीदने की गवाही ना दे... और जो पीढी आज शराब की लाइन में खडी है वो अपने सम्मान के प्रति जागरूक कैसे हो,
शराब एक सामाजिक बुराई है क्योंकि ये लोगों की बहुत बडी संख्या के बीच अपना स्थान बना चुका है लोग जो अत्यंत शिक्षित हैं वो भी शराब पी रहे हैं जो नहीं पढे लिखें हैं वो भी पी रहे हैं तो यह एक व्यापक रूप से फैला हुआ सामाजिक बीमारी है और इसको बंद करने की मांग करना मतलब सामाजिक परिवर्तन की मांग करना है और कोई भी सामाजिक परिवर्तन एकाएक तत्काल नहीं होता उसके लिए जागरूक होना पडता है
अब ये सोचिए कि आज शराब के लाइन में खडे हुए लोगों में यह जागरूकता कैसे ला सकते हैं
इसमें जितना दोषी शराब बेचने वाला है उससे बडा अपराधी है शराब खरीदने वाला,
वास्तविक दोषी वही है जो लाइन में खडा है शराब के लिए..
एक समय समाज में सती प्रथा एक बहुत बडी सामाजिक बुराई था जरा सोचिए राजा राम मोहन राय को उस समय सती प्रथा को बंद करने के लिए उस समय की परिस्थिति में कैसी परिस्थिति का सामना करना पडा होगा, उस समय के कुंठित मानसिकता ने क्या राजा राममोहन राय का विरोध नहीं किया होगा ? बिल्कुल किया होगा, और समय के साथ सती प्रथा का अंत हुआ, ऐसे ही शराब का भी अंत होगा, निश्चित रूप से होगा... बस इसे खतम करने का सही तरीका अपनाना होगा। हां, परंतु अभी वर्तमान की स्थिति में सरकार द्वारा ही मधुशालाओं को बंद रखने का शख्त हिदायत होना चाहिए।
उपाय जिससे दुरगामी सुधार होगा
1. सामाजिकरण
2. नैतिक शिक्षा : मशीनी शिक्षा ने आज युवाओं अपने समाज, धर्म के महत्व को नगण्य बना दिया है हर सुविधा के लिए बडा बडा मशीन बनाने की होड में लोग समाज, नातेदारी का महत्व को भूलते जा रहे हैं विवाह, परिवार एक सामाजिक व्यवस्था का प्रकार्यात्मक अंग है परंतु आज परिवार विवाह केवल औपचारिकता बनता जा रहा है इसका कारण है नैतिक शिक्षा की नितांत कमी, और केवल साक्षरता दर बढाने का उद्देश्य
3. रोजगार की सही परिभाषा विकसित होना क्योंकि आज लोग पढाई करने का अर्थ केवल नौकरी पाना समझते हैं और वास्तव में आज केवल नौकरी पाने के लिए लोग पढाई कर रहे हैं पढाई करके खेत में काम करना सब अपने स्टेटस के लिए खराब समझते हैं जबकि ऐसा नहीं है शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य केवल उचित और अनुचित को समझना है । मात्र नौकरी पाना नहीं ।
(किसी गलती पर सुझाव अवश्य देवें, यह मेरा मौलिक लेख है)
- उमराव सिंह
"शराब एक सामाजिक विकृति"
- उमराव सिंह
प्रस्तावना एवं अर्थ :- आपने एक शब्द "डिसॉर्डर" सुने और पढें हैं विज्ञान में डिसॉर्डर एक शारीरिक विकृति है डिसॉर्डर जैसा ही फिजियोलॉजी में एक शब्द Dysnomia डिस्नोमिया है जिसमें जब दिमाग ठीक से काम नहीं करता, या किसी चीज को याद रखने की क्षमता कम हो जाती है अर्थात मानसिक विकृति ऐसे ही शराब एक सामाजिक डिस्नोमिया बन चुका है या सामाजिक बुराई कह सकते हैं । जिस तरह शरीर को बिमारियां लगती है वैसे ही समाज को भी बीमारियां लगती है नशा, दहेज, हिंसा, मांसाहार ये सब सामाजिक बिमारियां है जिसे सोशल डिस्नोमिया कह सकते हैं ।
परिभाषा :- मानव समुदाय में व्याप्त वह नकारात्मक तत्व जो समाज की व्यवस्था को विकृत कर देती है और मनुष्य की सामाजिक, मानसिक और शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो जाता है। और उसकी सत्य को पहचानने की क्षमता एवं चिंतन करने की क्षमता कमजोर पड जाती है या नैतिक शिक्षा की कमी से विकसित ही नहीं हो पाती ।
विवेचना :- कल शराब शुरू हुआ और लम्बी लाइन भी लग गई, दिनभर फेसबुक में शराब के विरोध और शराबबंदी की मांग की हजारों आवाज उठी है लोग सोशल मिडिया में भर भर के शराब का विरोध किए, मगर शराब नहीं रूका, जिसको बेचना है बेच लिया जिसको पीना है पी लिया,
आज का समय कोरोना के कारण खतरनाक है ये बात लगभग सभी जानते हैं जिसके हाथ में मोबाइल है सोशल मीडिया है और जो टीवी के सामने बैठा है वो जानता है कि अभी कोरोना अत्यंत खतरनाक है लेकिन क्या वो आदमी भी उस लाइन में नहीं खडा है जो सबकुछ जानता है ? जब वो जानबूझकर लाइन में खडा है तो जो नहीं जानता वो किसी को क्यों महत्व देंगे...
इसमें बात केवल समझ की है
जो शराब के लिए लाइन में खडा उसको स्वयं के सम्मान की चिंता नहीं है उसको कोई फर्क नहीं पडता कि शराब लेते चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे, इस सम्मान का परवाह रहता तो वह खरीदने ही क्यों जाता,
शराबबंदी करो, हम पुरजोर विरोध करते हैं, ये गलत हो रहा है ऐसी ऐसी बातें केवल फेसबुक में लिख देने से क्या शराब बंद हो जाएगी।
आज कोरोना है इसलिए शराब के विरोध में आवाजें उठी हैं क्या इससे पहले किसी ने विरोध किया ?
मात्र हाथ जोडकर निवेदन करने से सुधार नहीं होता, उसके लिए कर्म करना पडता है
आज हमें ये चिंतन करने की जरूरत है कि शराब लोगों के दिमाग से कैसे निकले,
दुध देने वाली गाय को कोई जंगल में छोड कर नहीं आता, शराब दुध दे रही है जिस दिन दुध देना बंद कर देगा उस दिन शराब स्वतः खतम हो जाएगा मतलब जिस दिन लोग शराब खरीदना बंद कर देंगे उस दिन स्वतः शराब का हौसला टुट जाएगा
शराब के लिए जो लम्बी लाइन लगी हुई है उसका कारण शिक्षा की कमी है उसका कारण उसमे समझ की कमी है उसका कारण अपने सम्मान की चिंता की कमी है
केवल नाम गांव लिखने आ जाने से आदमी समझदार नहीं हो जाता, केवल साक्षरता को बढाने से समझदारी नहीं आएगी, लोगों में वास्तविक नैतिक शिक्षा का होना आवश्यक है
केवल नैतिक शिक्षा ही ऐसा हथियार है जिससे मानव समाज शराब को स्वतः छोड देगा फिर किसी आंदोलन की जरूरत नहीं पडेगी,
आज शराब इसलिए बिका है क्योंकि लाखों लोग इस खतरनाक समय में भी लाइन में लगकर शराब खरीदना पीना को गलत नहीं समझे हैं मतलब उसके दिमाग में इतनी समझ नहीं है कि हम शराब ना खरीदे,
तो ये सोचिए कि ऐसा स्थिति कैसे पैदा हो कि एक आदमी का हृदय शराब खरीदने की गवाही ना दे... और जो पीढी आज शराब की लाइन में खडी है वो अपने सम्मान के प्रति जागरूक कैसे हो,
शराब एक सामाजिक बुराई है क्योंकि ये लोगों की बहुत बडी संख्या के बीच अपना स्थान बना चुका है लोग जो अत्यंत शिक्षित हैं वो भी शराब पी रहे हैं जो नहीं पढे लिखें हैं वो भी पी रहे हैं तो यह एक व्यापक रूप से फैला हुआ सामाजिक बीमारी है और इसको बंद करने की मांग करना मतलब सामाजिक परिवर्तन की मांग करना है और कोई भी सामाजिक परिवर्तन एकाएक तत्काल नहीं होता उसके लिए जागरूक होना पडता है
अब ये सोचिए कि आज शराब के लाइन में खडे हुए लोगों में यह जागरूकता कैसे ला सकते हैं
इसमें जितना दोषी शराब बेचने वाला है उससे बडा अपराधी है शराब खरीदने वाला,
वास्तविक दोषी वही है जो लाइन में खडा है शराब के लिए..
एक समय समाज में सती प्रथा एक बहुत बडी सामाजिक बुराई था जरा सोचिए राजा राम मोहन राय को उस समय सती प्रथा को बंद करने के लिए उस समय की परिस्थिति में कैसी परिस्थिति का सामना करना पडा होगा, उस समय के कुंठित मानसिकता ने क्या राजा राममोहन राय का विरोध नहीं किया होगा ? बिल्कुल किया होगा, और समय के साथ सती प्रथा का अंत हुआ, ऐसे ही शराब का भी अंत होगा, निश्चित रूप से होगा... बस इसे खतम करने का सही तरीका अपनाना होगा। हां, परंतु अभी वर्तमान की स्थिति में सरकार द्वारा ही मधुशालाओं को बंद रखने का शख्त हिदायत होना चाहिए।
उपाय जिससे दुरगामी सुधार होगा
1. सामाजिकरण
2. नैतिक शिक्षा : मशीनी शिक्षा ने आज युवाओं अपने समाज, धर्म के महत्व को नगण्य बना दिया है हर सुविधा के लिए बडा बडा मशीन बनाने की होड में लोग समाज, नातेदारी का महत्व को भूलते जा रहे हैं विवाह, परिवार एक सामाजिक व्यवस्था का प्रकार्यात्मक अंग है परंतु आज परिवार विवाह केवल औपचारिकता बनता जा रहा है इसका कारण है नैतिक शिक्षा की नितांत कमी, और केवल साक्षरता दर बढाने का उद्देश्य
3. रोजगार की सही परिभाषा विकसित होना क्योंकि आज लोग पढाई करने का अर्थ केवल नौकरी पाना समझते हैं और वास्तव में आज केवल नौकरी पाने के लिए लोग पढाई कर रहे हैं पढाई करके खेत में काम करना सब अपने स्टेटस के लिए खराब समझते हैं जबकि ऐसा नहीं है शिक्षा का अर्थ एवं उद्देश्य केवल उचित और अनुचित को समझना है । मात्र नौकरी पाना नहीं ।
(किसी गलती पर सुझाव अवश्य देवें, यह मेरा मौलिक लेख है)
- उमराव सिंह
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