जेठ की ठंडी हवाएं...
-उमराव सिंह
हल्की बारीश हो गई और बारिश के बाद की गुलाबी हवाओं की सुगंध से आप वाकिब हैं लेकिन सोचने वाली बात ये है कि ये ज्येष्ठ का महिना है वो जेठ जिसमें चिलमिलाती धुप पडती थी जेठ के महिने में ऐसी ठंडी हवाओं की कल्पना प्रेमचंद की पुस की रात से ठीक विपरीत है क्योंकि पूस की रात की कडकडाती ठंड और जेठ की चिलमिलाती धुप से सब परिचित हैं मगर कल शाम को बल्ब और ट्यब लाइट के नीचे अत्यधिक संख्या में कुछ किडे पतंगें उड रहे थे जिसे हमारे बेमेतरा क्षेत्र में बत्तर किरा कहते हैं बुजुर्ग किसान जो जीवन भर जमीन पर अन्न उगाते आए हैं वो इन पतंगों को बरसात का संकेत मानते हैं इन पतंगों को बरसात का संकेत माना जाता है और ये पतंगें उस स्थिति में दिखाई पडते हैं जब किसान अपनी खेती की शुरुआत कर रहे होते हैं मुझे अच्छे से याद है पहले स्कूल जुलाई में खुलता था यह जुलाई बरसात का मौसम होता था और हम बच्चे आंगन में बैठे पढाई करते थे तो ये पतंगे आसपास उडने के बाद उनके खुब सारे पंख टुट कर गिरे रहते थे ये किडे न जाने क्यों केवल बरसात में ही दिखाई पडता था वो भी केवल दो चार दिन... फिर कहीं गायब...
इस बात को लिखने का कारण ये है कि मई जून यानि हिन्दी का बैशाख ज्येष्ठ का महिना, भयानक गर्मी, तापमान 26-47℃ तक पहुंच रहा था रोड में गन्ना रस, बर्फ गोला, आइसक्रीम और कोल्डड्रिंक की कतारें होनी पडती थी
अब जरा सोचे जेठ के महिने में आज ठंडी हवाएं, कुछ देर बारिश के बाद फिर से धुप, बत्तर किडा, और सुबह तो फाफा भी दिखा... ये सब संकेत है जलवायु परिवर्तन का.. जो अब स्थाई होता जाएगा, अब आने वाले जलवायु के अनुसार फसल चक्र भी परिवर्तित होना होगा, मौसमी गीतों में वो पहले जैसा अनुभव नहीं होगा बल्कि सावन में गर्मी का अनुभव होगा, बरसात और ठंड का मौसम आगे के महिनो में खिसकने लग रहा है...
मौसम और जलवायु में अंतर तो सब पढे ही हैं मौसम वो है जो तेजी से परिवर्तित होता है जैसे एक ही दिन में सुबह धुप और शाम को बारिश। और जलवायु लगभग 30 साल में परिवर्तित होती है इसीलिए आज से तीस साल पहले जिस तरह का बरसात, ठंड और गर्मी का महिना हुआ करता था वो अब काफी परिवर्तित हो चुका है पिछले तीस साल पहले जैसा जलवायु अभी नहीं है... जैसे झडी, आज के बच्चे तो झडी क्या है इसको नहीं जानते झडी उसे कहते थे जब एक हफ्ते पंद्रह दिन तक लगातार पानी गिरते रहता था हफ्तों हफ्तों सुर्य दिखाई नहीं देता था । पहले जैसा जलवायु का कुछ अंश भी अभी चाहिए तो उसके लिए बहुत बडे पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा, पलायन छोडकर खेती की ओर बढना ही होगा, यदि ठान लें इतनी बडी आबादी के लिए बडी बात नहीं है एक आदमी अपने नाम से एक पेड लगाए तो भी सवा अरब पेड होता है... जलवायु परिवर्तन...
- उमराव सिंह
-उमराव सिंह
हल्की बारीश हो गई और बारिश के बाद की गुलाबी हवाओं की सुगंध से आप वाकिब हैं लेकिन सोचने वाली बात ये है कि ये ज्येष्ठ का महिना है वो जेठ जिसमें चिलमिलाती धुप पडती थी जेठ के महिने में ऐसी ठंडी हवाओं की कल्पना प्रेमचंद की पुस की रात से ठीक विपरीत है क्योंकि पूस की रात की कडकडाती ठंड और जेठ की चिलमिलाती धुप से सब परिचित हैं मगर कल शाम को बल्ब और ट्यब लाइट के नीचे अत्यधिक संख्या में कुछ किडे पतंगें उड रहे थे जिसे हमारे बेमेतरा क्षेत्र में बत्तर किरा कहते हैं बुजुर्ग किसान जो जीवन भर जमीन पर अन्न उगाते आए हैं वो इन पतंगों को बरसात का संकेत मानते हैं इन पतंगों को बरसात का संकेत माना जाता है और ये पतंगें उस स्थिति में दिखाई पडते हैं जब किसान अपनी खेती की शुरुआत कर रहे होते हैं मुझे अच्छे से याद है पहले स्कूल जुलाई में खुलता था यह जुलाई बरसात का मौसम होता था और हम बच्चे आंगन में बैठे पढाई करते थे तो ये पतंगे आसपास उडने के बाद उनके खुब सारे पंख टुट कर गिरे रहते थे ये किडे न जाने क्यों केवल बरसात में ही दिखाई पडता था वो भी केवल दो चार दिन... फिर कहीं गायब...
इस बात को लिखने का कारण ये है कि मई जून यानि हिन्दी का बैशाख ज्येष्ठ का महिना, भयानक गर्मी, तापमान 26-47℃ तक पहुंच रहा था रोड में गन्ना रस, बर्फ गोला, आइसक्रीम और कोल्डड्रिंक की कतारें होनी पडती थी
अब जरा सोचे जेठ के महिने में आज ठंडी हवाएं, कुछ देर बारिश के बाद फिर से धुप, बत्तर किडा, और सुबह तो फाफा भी दिखा... ये सब संकेत है जलवायु परिवर्तन का.. जो अब स्थाई होता जाएगा, अब आने वाले जलवायु के अनुसार फसल चक्र भी परिवर्तित होना होगा, मौसमी गीतों में वो पहले जैसा अनुभव नहीं होगा बल्कि सावन में गर्मी का अनुभव होगा, बरसात और ठंड का मौसम आगे के महिनो में खिसकने लग रहा है...
मौसम और जलवायु में अंतर तो सब पढे ही हैं मौसम वो है जो तेजी से परिवर्तित होता है जैसे एक ही दिन में सुबह धुप और शाम को बारिश। और जलवायु लगभग 30 साल में परिवर्तित होती है इसीलिए आज से तीस साल पहले जिस तरह का बरसात, ठंड और गर्मी का महिना हुआ करता था वो अब काफी परिवर्तित हो चुका है पिछले तीस साल पहले जैसा जलवायु अभी नहीं है... जैसे झडी, आज के बच्चे तो झडी क्या है इसको नहीं जानते झडी उसे कहते थे जब एक हफ्ते पंद्रह दिन तक लगातार पानी गिरते रहता था हफ्तों हफ्तों सुर्य दिखाई नहीं देता था । पहले जैसा जलवायु का कुछ अंश भी अभी चाहिए तो उसके लिए बहुत बडे पैमाने पर वृक्षारोपण करना होगा, पलायन छोडकर खेती की ओर बढना ही होगा, यदि ठान लें इतनी बडी आबादी के लिए बडी बात नहीं है एक आदमी अपने नाम से एक पेड लगाए तो भी सवा अरब पेड होता है... जलवायु परिवर्तन...
- उमराव सिंह
Nice....
जवाब देंहटाएं🙏🙏👍👍
जवाब देंहटाएंsaprem saheb bandagi saheb
जवाब देंहटाएंsaprem saheb bandagi saheb
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